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ऐपण गर्ल मीनाक्षी नें उत्तराखंड की लोककला ऐपण को रोजगार से जोड़ दिलाई नयी पहचान

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में नैनीताल जनपद के रामनगर की रहने वाली मीनाक्षी खाती अभी महज 23 वर्ष की है। लेकिन इतनी छोटी उम्र में ही वो वर्तमान में अपनी बेहतरीन चित्रकला से पूरे देश के लोगों के मध्य चर्चित है। मीनाक्षी की शानदार कला की वजह से पूरे देश में मीनाक्षी उत्तराखंड की ‘ऐपण गर्ल‘ के रूप में प्रसिद्ध है।

मीनाक्षी नें अपनी स्कूल और काॅलेज में अपने सहपाठीयों को भी ऐपण कला सिखाई। वहीं मीनाक्षी नें ऐपण कला नया लुक दिया ताकि इस कला को बढ़ावा मिले। मीनाक्षी नें चाय के कप, नेम प्लेट से लेकर चाबी के छल्ले, रिंग, पूजा की थाली सहित विभिन्न प्रकार अभिनव प्रयोग ऐपण कला को लेकर किया है। ये अभिनव प्रयोग लोगों को बेहद भाये।

अभिनव प्रयोग के लिए पहचानी जाती हैं मीनाक्षी

मीनाक्षी नें ऐपण कला को न केवल संजोए रखा अपितु इससे रोज़गार के अवसरों का सृजन भी किया। मीनाक्षी वर्तमान में मीनाकृति -ऐपण प्रोजेक्ट की सीईओ है। जिसके जरिए मीनाक्षी नें लोगों को ऐपण का प्रशिक्षण और रोजगार दिला रही है।

लाॅकडाउन के दौरान मीनाक्षी नें ऑनलाइन ऐपण प्रतियोगिता भी कराई ताकि ऐपण की छुपी प्रतिभाओं को आगे आनें का अवसर मिल सके। आज ऐपण कला लोगों की आर्थिकी भी बढा रही है।

ये है उत्तराखंड की ऐपण कला!

अपनी समृद्धशाली सांस्कृतिक विरासत व अनमोल परंपराओं, लोककलाओं के कारण उत्तराखंड देश ही नहीं बल्कि दुनिया में अपनी अलग ही पहचान रखता है। यहां पर एक से एक अनूठे लोकपर्व मनाए जाते हैं जो यहां की प्रकृति, भूमि ,जंगल, देवताओं को समर्पित रहते हैं। इसी के साथ ही यहां पर ऐसी कई सारी लोक कलाएं भी मौजूद है जो बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इन्हीं में से एक लोक कला / लोक चित्रकला है जिसे ऐपण (Aipan) कहा जाता है।

अपने परिजनों के साथ ऐपण कला से बनायी गयी कलाकृति

उत्तराखंड की इस गौरवशाली परंपरा को ‘ऐपण गर्ल’ मीनाक्षी खाती नयी पहचान दिला रही है। उत्तराखंड के कुमाऊं में किसी भी मांगलिक कार्य के अवसर पर अपने अपने घरों को सजाने की परंपरा है। यह कुमाऊं की एक लोक चित्रकला की शैली है जो अपनी अलग पहचान बना चुकी है। परंपरागत ऐपण प्राकृतिक रंगों से बनाए जाते हैं जैसे गेरू (एक प्रकार की लाल मिट्टी जो पहाड़ में पाई जाती है ) और चावल के आटे (चावल के आटे में पानी मिलाकर उसे थोड़ा पतला बनाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में बिस्वार कहते हैं) से बनाई जाती है।

इसमें महिलाएं विभिन्न प्रकार के चित्र बनाकर घर के आंगनों ,दरवाजों, दीवारों, मंदिरों को सजाती हैं जिन्हें ऐपण कहते हैं। जो घर की सुंदरता को तो बढ़ाते ह़ी है साथ ही साथ मन में पवित्रता का भाव भी पैदा कर देते हैं। ऐपण का अर्थ लीपने से होता है और लीप शब्द का अर्थ अंगुलियों से रंग लगाना है।

ऐपण बनाने वक्त महिलाएं चांद, सूरज, स्वस्तिक, गणेश जी, फूल,पत्ते, बेल बूटे, लक्ष्मी पैर, चोखाने, चौपड़, शंख, दिये, घंटी आदि चित्र खूबसूरती से जमीन पर उकेरती हैं। जिस जगह पर ऐपण बनाने होते हैं उस जगह की पहले गेरू से पुताई की जाती हैं, उसके बाद उसमें बिस्वार से डिज़ायन बनाये जाते हैं।

ऐपण कला को दर्शाती पेंटिंग

दीपावली के अवसर पर कुमाऊं के घर-घर एपण से सज जाते हैं। घरों को आंगन से घर के मंदिर तक ऐपण देकर सजाया जाता है। दीपावली में बनाए जाने वाले ऐपण में मां लक्ष्मी के पैर घर के बाहर से अन्दर की ओर बनाए जाते है। दो पैरों के बीच के खाली स्थान पर गोल आकृति बनायी जाती है जो धन का प्रतीक माना जाता है। पूजा कक्ष में भी लक्ष्मी की चौकी बनाई जाती है। माना जाता है कि इससे लक्ष्मी प्रसन्न होती है और घर परिवार को धनधान्य से पूर्ण करती है। इनके साथ लहरों, फूल मालाओं, सितारों, बेल-बूटों व स्वास्तिक चिन्ह की आकृतियां बनाई जाती है माना जाता है यह इनमें तांत्रिक प्रभाव को प्रबलब नाती है। अलग-अलग प्रकार के ऐपण बनाते समय अनेक मंत्रों का भी उच्चारण करने की परंपरा है।

ऐपण बनाते समय कई त्योहारों पर मांगिलक गीतों का गायन भी किया जाता रहा है। गोवर्धन पूजा पर ‘गोवर्धन पट्टा तथा कृष्ण जन्माष्टमी पर ‘जन्माष्टमी पट्टे बनाए जाते हैं। नवरात्र में ‘नवदुर्गा चौकी तथा कलश स्थापना के लिए नौ देवियों एवं देवताओं की सुंदर आकृतियों युक्त ‘दुर्गा चौकी बनाई जाती है। सोमवार को शिव व्रत के लिए ‘शिव-शक्ति चौकी बनाने की परंपरा है । सावन में पार्थिव पूजन के लिए ‘शिवपीठ चौकी तथा व्रत में पूजा-स्थल पर रखने के लिए कपड़े पर ‘शिवार्चन चौकी बनाई जाती है। ऐपण में लोगों की कलात्मक, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी दिखाई देती है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान मीनाक्षी

दादी और माँ से विरासत में मिली ‘ऐपण’ बनाने की कला!

उत्तराखंड में खासतौर पर कुमाऊं परिक्षेत्र में ऐपण का जो रूप सदियों पहले था वही रूप आज भी है बल्कि यूं कह सकते हैं कि समय के साथ-साथ यह और भी समृद्ध हो चला है। जिसमें सबसे अहम योगदान यहाँ की महिलाओं का रहा है। जो पीढी दर पीढी इस कला को एक दूसरे को हस्तांतरित करती है। मीनाक्षी नें भी ऐपण कला की बारकिंया अपनी दादी और माँ से सीखा।

मीनाक्षी कहती है कि जब भी घर में मेरी दादी और माँ ऐपण बनाती थी तो मैं बडे ध्यान से देखती थी। मुझे बचपन से ही ऐपण कला आकर्षित करती थी और आज मैं भी ऐपण बनाने लगी हूँ। ऐपण गर्ल नें अपने पूरे घर के कोने कोने को ऐपण की खूबसूरती से सजाया है। जहां भी नजर पडे आपको बेहतरीन चित्रकारी का नमूना दिखाई देगा। ये घर नहीं बल्कि चित्रकला का कोई म्यूजियम नजर आता है।

मीनाक्षी ने ऐपण को रोजगार से जोड़ने का काम किया

गौरतलब है कि कुमाऊं की इस समृद्धशाली कला को महिलाओं ने ह़ी जीवित रखा हैं। इस अनमोल धरोहर को सजाने, संवारने, सहेजने की जिम्मेदारी महिलायें बरसों से बखूबी निभाती आ रही है। महिलाएं इस चित्रकला के माध्यम से अपने मन के भाव व अपनी शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति उस ईश्वर के प्रति व अपने घर के प्रति करती है। इससे न सिर्फ घर सुंदर दिखता है बल्कि पवित्र भी हो जाता है। मन व माहौल एक नये उत्साह और उमंग से भर जाता है।

बकौल ‘ऐपण गर्ल’ मीनाक्षी खाती हमारी पहचान ही हमारी लोकसंस्कृति और सांस्कृतिक विरासत है। इसका संवर्धन और संरक्षण आवश्यक है। जिससे आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत की जानकारी हो। युवा पीढ़ी को चाहिए की अपनी लोकसंस्कृति को कभी भी न बिसराये।

मैंने ऐपण के जरिये छोटी सी कोशिश की है कि अपनी लोकसंस्कृति को दूसरे लोगों तक पहुंचा सकूं। हमें अपनी इस लोकविरासत को नयी पहचान दिलाने के लिए कुछ मार्डन प्रयोग करने होंगे ताकि ये कला लोगों तक आसानी से पहुंच सके। मुझे खुशी है कि मैं काफी हद तक इसमें सफल भी हुई हूँ।

मीनाक्षी को मिल चुके है कई सम्मान

अलग-अलग प्रदेशों में अलग अलग नामों से जाने जाते हैं!

रंगो और कूची की इस कला को उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में ऐपण नाम से जाना जाता है। वहीं केरल में कोल्लम, बंगाल त्रिपुरा व आसाम में अल्पना, उत्तर प्रदेश में साची और चौक पुरना, बिहार में अरिपन, आंध्र प्रदेश में मुग्गु, महाराष्ट्र में रंगोली और राजस्थान में इस कला को मॉडला के नाम से जाना जाता है। सभी कलाओं में रंगो से चित्रकारी की जाती है।

वास्तव में देखा जाए तो सोशल मीडिया के दौर में जहाँ युवा पीढ़ी अधिकतर समय इन्ही सोशल साइटों पर अपना समय खर्च करते हैं, वहीं दूसरी ओर इतनी छोटी उम्र में ‘ऐपण गर्ल’ मीनाक्षी खाती जैसी युवाओं का अपनी लोकसंस्कृति के प्रति लगाव और उसे आगे बढ़ाने की ललक सुखद है। जो भविष्य के लिए उम्मीदें जगाता है। मीनाक्षी नें ऐपण कला को रोजगार से जोडने की अभिनव पहल कर रोजगार के अवसर सृजित किये हैं।

एक सम्मान समारोह के दौरान मीनाक्षी

मीनाक्षी को दिल्ली, देहरादून, श्रीनगर, हल्द्वानी सहित विभिन्न जगहों में ऐपण में सराहनीय कार्य के लिए कई पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

बी पॉजिटिव इंडिया’, मीनाक्षी खाती द्वारा किए कार्यों की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

संजय चौहान
संजय चौहान
संजय चौहान उत्तराखंड से हैं और पॉजिटिव जर्नलिज्म के लिए जाने जाते हैं.

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