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अपूर्वा त्रिपाठी: 20 लाख का पैकेज ठुकरा आदिवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में जुटी है यह युवती

आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के निर्देशों के अनुरूप कोरोना वायरस से लड़ने वाला हर्बल क्वाथ बनाया अपूर्वा ने। अब हर्बल चाय और क्वाथ कोरोना  सहित 16 अन्य बीमारियों से बचा रहा है। जल्द ही यूरोप- अमेरिका भी लेंगे सुश्री त्रिपाठी के इन हर्बल उत्पादों की चुस्कियां। 

इस सदी की सबसे मनहूस बीमारी कोरोना ने आज समाज में ढेर सारे परिवर्तन कर दिए हैं। सम्भव है कि आने वाले दिनों में भी हमें बहुत सारे परिवर्तन और देखने को मिलें। इस कोरोना ने तो हमारे सामाजिक नायकों की परिभाषा ही बदल कर रख दी। अब से पहले फिल्मी सितारे, क्रिकेटर या अन्य खेलों के सफल खिलाड़ी हमारे नायक हुआ करते थे।

कोरोना में डॉक्टर तथा समाज के कमजोर वर्ग की मदद के लिए आगे आए योद्धा आज के नायकों के रूप में स्थापित हुए हैं। नायकों के पुराने प्रतिमान टूट रहे हैं, नित-नए प्रतिमान बन रहे हैं। नए दौर की एक ऐसी ही नायिका का नाम सुश्री अपूर्वा त्रिपाठी है जो देश के सबसे पिछड़े तथा संवेदनशील क्षेत्र बस्तर में रहती हैं।

प्रदर्शनी में MDHG ग्रूप की स्टाल पर अपूर्वा

जिस किसी ने इन्हें अपनी आदिवासी महिला साथियों के साथ खेतों में काम करते हुए देखा हो, वह इन्हें अपने दफ्तर में कॉर्पोरेट अवतार में देखकर एकबारगी चौंकेगा जरूर!

विभिन्न देशों के खरीदारों से गुणवत्ता को लेकर विभिन्न भाषाओं में अपूर्वा को बहस करते देखकर लोगों को यकीन नहीं होता कि यह वही लड़की है, जो बस्तर के खेतों में आदिवासी महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेती करती है।

बकौल अपूर्वा,“विदेशी जैविक हर्बल खेती से जुड़े समूहों को देश-विदेश के कॉर्पोरेट के साथ अगर सफल कारोबारी रिश्ते कायम करने हैं, तो इसके लिए कॉर्पोरेट के स्थापित नियम कायदों, मापदंडों तथा उनकी क्रियाविधि को समझना बेहद जरूरी है।

MDHG की महिला सदस्यों के साथ

बचपन में मिले संस्कार जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ने के लिए खाद-पानी रूपी प्रेरणा देते हैं। आम लोगों की धारणा है कि आज का युवा चमक-दमक और ग्लैमर के मोहपाश में फंसा है, जो कि काफ़ी हद तक यह सही है। बस्तर की इस बेटी के साथ ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। 

ठेठ आदिवासी गांव में जन्मी और पली-बढ़ी अपूर्वा की बात ही निराली है, उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसे मूलभूत गुण हैं जो उन्हें आज के युवाओं से अलग साबित करते हैं। 

कुमारी अपूर्वा ने छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठित कलिंगा यूनिवर्सिटी से स्नातक और विधि स्नातक की डिग्री लेने के बाद ‛बौद्धिक संपदा अधिकार’ जैसे विषय में एलएलएम की डिग्री भी हासिल की है। पर इतने से उन्हें संतोष नहीं हुआ। व्यवसायिक विधि में महाराष्ट्र विश्वविद्यालय से दूसरा एलएलएम भी उच्च श्रेणी में किया। अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा संरक्षण कानून, अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट लॉ में भी इस बाला ने डिप्लोमा किया है। अभी भी शिक्षा जारी रखते हुए वे बस्तर की आदिवासी महिलाओं के कानूनी अधिकारों की चेतना पर जागृति हेतु शोध कार्य कर रही हैं।

स्कूली छात्राओं के साथ अपूर्वा

अपनी शिक्षा के दौरान अर्जित ज्ञान का इस्तेमाल वे अपनी संस्थान ‘संपदा’ द्वारा आदिवासियों की बौधिक संपदा के संरक्षण के लिए कर रही हैं। अपूर्वा बस्तर और आसपास के आदिवासियों के समग्र विकास और उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए सतत प्रयासरत हैं। वे मां दंतेश्वरी हर्बल समूह को विधिक सेवाएं भी प्रदान करती हैं।

छत्तीसगढ़ के सबसे पिछड़े बस्तर अंचल के कोंडागांव जिले के ग्राम चिखलपुटी और आसपास के गांवों की करीब 400 आदिवासी महिलाएं ‛मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ से जुड़ी हुई हैं, जिसकी अध्यक्ष दशमति नेताम हैं, जो स्वयं बस्तर की आदिवासी महिला हैं। इस संस्थान की गुणवत्ता नियंत्रण तथा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग का कार्य सुश्री त्रिपाठी देखती हैं।

बौद्धिक संपदा अधिकार अधिनियम की जानी-मानी विशेषज्ञ अपूर्वा को बीस लाख रुपए सालाना के पैकेज के ऑफर मिले, लेकिन उन्होंने इसे ठुकराकर अपनी जन्मभूमि बस्तर में आदिवासी महिलाओं के साथ जुड़कर निस्वार्थ भाव से नि:शुल्क सेवा को प्राथमिकता दी।

खेतों में किसानों के साथ अपूर्वा

अपने इतिहास और पारंपरिक आदिवासी कलाओं के लिए मशहूर छत्तीसगढ़ इन दिनों हर्बल खेती के क्षेत्र में नाम कमा रहा है। गौर से देखें तो पता चलता है कि जड़ी-बूटियों की औषधीय खेती में आज राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपनी पहचान बनाने वाला ‛कोंडागांव’ इसी राज्य का एक हिस्सा है।

अपूर्वा अपने इसी नए कैरियर की शुरुआत के बारे में बताती हुई कहती हैं,“करीब 25 साल पहले देश के जाने-माने वनोषधीय कृषक डॉ राजाराम त्रिपाठी ने इस गांव के आसपास की महिलाओं को जोड़कर समूह की स्थापना की। पहले दालचीनी फिर काली मिर्च सहित दर्जनों प्रकार की भारतीय दुर्लभ जड़ी बूटियां आज समूह द्वारा उगाई जा रही हैं। कुछ वर्षों बाद स्टीविया और इंसुलिन की खेती भी शुरू हुई। इस खेती से आदिवासियों की आमदनी में बढ़ोत्तरी हुई और उनके जीवनस्तर में सुधार आया।

यह सब कुछ मैंने बचपन से देखा और स्वाभाविक तौर पर यह कार्य मेरे मन मस्तिष्क में रचा-बस गया। मैंने इसको आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे चीज़ें बदलती चली गईं, आज मां दंतेश्वरी समूह की अपने कार्यों की वजह से राज्य में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में एक अलग पहचान है। इस पहचान को बनाने में कोंडागांव के आदिवासी समुदाय के पुरुष व महिलाओं का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है।”

खेत, ज़मीन और जंगल से जुड़ाव है अपूर्वा को

डॉ त्रिपाठी के मार्गदर्शन व और सुश्री अपूर्वा की देखरेख में इन आदिवासी महिलाओं ने मात्र एक रुपए कप की कीमत में ऐसी ज़बरदस्त हर्बल चाय बनाई जो कोरोना सहित 16 से अधिक अन्य बीमारियों में काम आती है।

इस हर्बल चाय को सबसे पहले यूरोप में बेचा गया और जब विदेशियों के मुंह इसका स्वाद लगा और उनको फायदा मिलने लगा तो भारतीय बाजार ने भी इसकी सुध ली। 

अब तो देश हो या विदेश स्वास्थ्य को लेकर जागरूक लोग इस अनूठी, शत प्रतिशत जैविक तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा प्रमाणित इस ‛हर्बल चाय’ के स्वाद, खुशबू और गुणों के दीवाने हो चुके हैं। इस हर्बल चाय की कीमत इतनी कम है कि गरीब से गरीब आदमी की पहुंच में भी इसकी खरीदी संभव है।

डॉ राजाराम त्रिपाठी के साथ अपूर्वा

अपूर्वा के लिए इसके बाद का पड़ाव बेहद महत्वपूर्ण रहस्य। देश में जब कोरोना ने पैर पसारे तो उन्होंने कुछ नया करने की ठानी। उन्होंने भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा जारी गाइडलाइन के तहत बस्तर के खेतों में उगाई जड़ी बूटियों से कोरोना की लड़ाई में बेहद मददगार माना जाने वाला ‛हर्बल क्वाथ’ बना डाला।

अपने उत्पादन की गुणवत्ता के चलते उन्होंने भारत सरकार के ‛खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण’ के साथ ही ‛विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (WHO) का प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिया। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य कोरोना से लड़ने वाली इस हर्बल दवाई की कीमत को कम से कम रखते हुए देश के ज्यादा से ज्यादा व्यक्तियों तक पहुंचाना है।

उनका या फार्मूला कोरोना से बचाने में सहायक सिद्ध होने के साथ ही अन्य कई असाध्य बीमारियों से बचाने में भी सक्षम पाया गया है। उनकी मान्यता है कि हमारी प्राचीन परंपरा के अनुरूप ‌‛वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना के तहत संपूर्ण विश्व एक परिवार की भांति है, इसलिए आगे चलकर अपूर्वा भारत की अनूठी बौद्धिक संपदा की देन हर्बल चाय तथा हर्बल क्वाथ जैसे लाभदायक तथा निरापद उत्पादों को विश्व के अन्य देशों तक पहुंचाकर कोरोना और अन्य बीमारियों से बचाने में मदद करना चाहती हैं।

एक अवार्ड समारोह के दौरान अपूर्वा

अपूर्वा का कहना है कि उन्होंने यह तय कर लिया है कि वह मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के माध्यम से आदिवासी समुदाय को समाज की मुख्यधारा से जोड़ेंगी तथा देश में उनकी नई पहचान स्थापित करेंगी। इसी पर वे आदिवासियों की पारंपरिक कृषि तकनीक के जरिए वनोषधियों की खेती, संरक्षण, संवर्द्धन पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही हैं। मां दंतेश्वरी हर्बल समूह द्वारा संयुक्त राष्ट्र द्वारा रेड डेटा बुक में शामिल चार सौ से अधिक प्रजातियों की जड़ी बूटियों का उनके नैसर्गिक वातावरण में मेडिको गार्डन बनाकर, संरक्षण-संवर्द्धन कर रही हैं जो कि हर्बल विज्ञान के शोधार्थियों के लिए बहुत  उपोयोगी साबित हो रहा है। 

जिस उम्र में युवा अपना कैरियर तलाशने में लगे रहते हैं, उस में अपूर्वा अपने जैसे सैकड़ों युवाओं को रोजगार उपलब्ध करवा कर आत्मनिर्भरता की एक नज़ीर पेश कर रही हैं। वे युवाओं को नई राहें दिखाकर उनकी प्रेरणा स्त्रोत बन गई हैं।

बी पॉजिटिव इंडिया’ उन्हें शुभकामनाएं देते हुए इसी तरह आगे बढ़कर अपने नवाचारों, उद्यमों में सफल होने तथा देश के युवाओं के लिए इसी तरह मिसाल बनकर मिसाल कायम करते रहने को प्रेरित करता है।

अपूर्वा से उनके फेसबुक के माध्यम से जुड़ा जा सकता है।

प्रस्तुति: मोईनुद्दीन चिश्ती (देश के वरिष्ठ लेखक- पत्रकार हैं और अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए ख़ासे लोकप्रिय हैं)

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MOINUDDIN RBS CHISHTY
लेखक स्वतंत्र कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं। वे अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए देशभर में लोकप्रिय हैं।

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