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एपी गौड़: इस पत्रकार ने ट्रेंड पर चलने की बजाय खुद की सफलता से खुद ट्रेंड सेट किए

किसी ने क्या ख़ूब कहा है-“जो तूफानों में पलते हैं,वही दुनिया बदलते हैं…!

यह बात जोधपुर में रहने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी अयोध्या प्रसाद गौड़ पर सटीक बैठती है। पत्रकार, लेखक, रंगकर्मी, मोटिवेशनल स्पीकर, जनसंपर्क अधिकारी और इन सबसे बढ़कर अपनी मां अयोध्या कुमारी के सुपुत्र और अपने बच्चों के पिता के रूप में उन्होंने अलग पहचान क़ायम की है। वे यारों के भी यार हैं।

मौजूदा समय में वे बाड़मेर स्थित वेदांता-केयर्न आयल एंड गैस में कॉरपोरेट कम्युनिकेशन में जीएम के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनके जीवन के संघर्षों की कहानी किसी फिल्मी कथानक सी लगती है। जीवन में लाख दुखों से रूबरू होने के बाद भी उनकी सकारात्मक सोच में कोई बदलाव नहीं आया। उनकी समझ है कि दुख हमें तोड़ने नहीं, मांझने आते हैं। इसी चमक के साथ हम जीवन में आगे के पायदानों पर सफलतापूर्वक क़दम बढ़ा पाते हैं।

अयोध्या प्रसाद जिन्हें ‛एपी’ के नाम से भी लोकप्रियता हासिल है, ने जियोलॉजी में मास्टर ऑफ साइंस करने के बाद दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े अखबारों में पत्रकारिता की। इंडिया टुडे के अलावा कई प्रकाशनों में लिखा। एक लेखक के तौर अब तक ‛द रॉयल ब्लू’, ‛दुर्ग गाथा’, ‛चौथा धंधा’ और ‛द वल्चर्स फीस्ट’ जैसी 4 पुस्तकें छप चुकी हैं।

बातचीत के दौरान अपने जीवन के पन्ने पलटते हुए वे बताते हैं,“जब छठी कक्षा पास की, समझ लीजिए तबसे संघर्ष से साझेदारी है। इस सी छोटी उम्र में संघ मुझसे दोस्ती कर बैठा।

जब पिताजी अपनी नौकरी से रिटायर हुए तो हम घरवालों को पता चला कि उन्हें पार्किंसन की बीमारी है। यह ऐसा दुरूह दौर था, जब पिताजी की पेंशन घर खर्च में कम पड़ने लगी थी। घर को सुचारू रूप से मदद पहुंचाने के लिए मैंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। मैं तब 9वीं में था। फर्स्ट ईयर में रहते हुए स्कूल में पार्ट टाइम जॉब की।

अब तक चार किताबें लिख चुके हैं

‘एपी’ के लिए, यह वह दौर था जब उन्हें पढ़ाई की चिंता की बजाय घर में पैसे देकर मां को आर्थिक मदद पहुंचाने की चिंता सताया करती थी।

इसी चिंता को परिणाम में बदलने के लिए उन्होंने उस दौर में बहुप्रचलित टीवी रिपेयरिंग का कोर्स किया। घर में इकट्ठा होने वाली रद्दी को मुहल्ले में आने वाले कबाड़ी के हाथों बेचने की बजाय घंटाघर के कबाड़ी बाज़ार ले जाकर बेचना शुरू किया, ताकि प्रति किलो ज्यादा भाव मिलें। इस अतिरिक्त आय से वे किताबें खरीदते।

किताबें पढ़ने का शौक उन्हेंतीसरी कक्षा से लग गया था। जिस उम्र में बच्चे दोस्तों के साथ मौज़ उड़ाते, ‛एपी’ डीडवाना की सिटी लाइब्रेरी में पढ़ने जाते, किताबों से मन रमाते। यहां वे पढ़ने के अलावा पुस्तकालय में मददगार की भूमिका भी निभाते। इसका भी फायदा था। बदले में लाइब्रेरी वाले घर ले जाने के लिए एक्सट्रा बुक्स दे देते। उनका मानना है कि इसी किताबी चस्के ने उन्हें जीवन में आगे बढ़ने में मदद की।

संघर्षों की अगली कड़ी में, एक दौर ऐसा भी आया जब प्री इंजीनियरिंग टेस्ट में उनका चयन नहीं हुआ। इस सदमे से वे बुरी तरह टूट गए। इसके पीछे एक कारण यह भी था कि घर की सारी जमा पूंजी वे इस सपने को पूरा करने के लिए दांव पर लगा चुके थे।

उनके मन में यहीं से खुद को नकारा मानने के भाव ने जन्म लिया। उन्हें लगने लगा कि एक इंसान के तौर पर वे कुछ भी कर पाने में विफल हुए हैं। फिर उनके जीवन में थिएटर आया, जिसने उनकी इस सोच को बदलने में अहम भूमिका निभाई।

विजय तेंदुलकर के ‛सफ़र’ नाटक में उन्होंने मुख्य किरदार निभाकर रंगमंच के इस सफ़र में अपनी जगह पक्की कर ली। नाटक विष्णुदत्त जोशी ने निर्देशित किया, जो उस दौर में रेडियो और रंगमंच की दुनिया के बड़े नामों में से एक थे।

एक कार्यक्रम के दौरान अयोध्या प्रसाद गौड़

आकाशवाणी से गहरा जुड़ाव रखने वाले ‛एपी’ ने कोई 60 से अधिक मंचीय और रेडियो नाटकों के विभिन्न किरदारों में अपने अभिनय की जीवंतता से प्राण फूंके हैं।

वे बताते हैं कि अभिनेता जिम कैरी की मूवी ‛यस मैन’ का भी उनके जीवन पर गहरा प्रभाव है। इसी को देखने के बाद उन्होंने हर जगह ‛यस’ कहना शुरू किया। पत्रकारिता को भी ‛यस’ इसी क्रम में कहा।

ये और बात है कि हर परिस्थिति में ‛यस’ कह देने के बाद कई-कई दिनों तक उन्हें इस सदमे में नींद नहीं आई कि हां तो भरदी, अब यह काम कैसे होगा?

देश-प्रदेश की हस्तियों के साथ अयोध्या प्रसाद गौड़

वे कहते हैं कि आपको अपनी रुचि से जुड़े काम करने पर भी सफलता मिलती है। किसी भी कार्य को करते वक़्त बस आप अपना 100% देने से पीछे नहीं हटें, शर्त यही है।

आप जिस भी कार्यक्षेत्र में हैं, उसमें अपने टूल्स को सदैव शार्प करते रहें। लीक पर चलने से बचें। ट्रेंड पर चलने की बजाए ट्रेंड सेटर बनें।

‘एपी’ की सोच यह है कि आप जीवन में सिर्फ नौकरी के बारे में न सोचें, जो काम आपके दिल के ज्यादा करीब हैं, उन्हें भी करते रहें। इसी सोच के मद्देनजर उन्होंने जोधपुर राजघराने की राजमाता कृष्णा कुमारी के जीवन पर आधारित जीवनी ‛रॉयल ब्लू’ को उपन्यास फॉर्मेट में लिखकर नया ट्रेंड इज़ाद किया। आगे चलकर इसी पुस्तक ने ‛अमेज़न 100 बेस्ट सेलर’ में जगह बनाई।

अब तक उनका जीवन विविधताओं से भरा हुआ रहा

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले इस देश में उन्होंने ‛चौथा धंधा’ जैसी पुस्तक लिखकर पत्रकारिता के पीछे के काले कारोबार पर करारा व्यंग्य भी कसा।

जीवन में संतुष्टि कभी नहीं आती, हम सब जीवनभर ‛वर्क इन प्रोग्रेस’ रहते हैं। चुनोतियों के अंत का मतलब हमारे जीवन का अंत है। एक समय पश्चात आपके जीवन में पैसा मायने नहीं रखता, लेकिन संघर्ष आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा जरूर देता है।

कभी वह भी दिन थे, जब बिल न भर पाने के चलते घर की बिजली काट दी जाती थी, कई दिनों तक ऐसे ही गुजारा करना पड़ता। आस पड़ोस के लोगों के पूछने पर यह कहकर टाल जाया करते कि तार हिल गया है।

एक वह भी दौर था, जब पिता द्वारा दिलाई 1000 रुपए से भी कम कीमत की सायकिल में इतनी खुशी मिली, जितनी आज 45 लाख की कार में बैठकर नहीं मिल रही। कुल मिलाकर गुज़रे दौर की जीवंत यादों से जीवन को आसान बनाने का फलसफा ‛एपी’ गौड़ से सीखा जा सकता है।

अवार्ड समारोह के दौरान अयोध्या प्रसाद गौड़

सूत्र यही है कि खुशियों को कभी भी पैसों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

बी पॉजिटिव इंडिया’ अयोध्या प्रसाद गौड़ द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में दी गई उनकी सेवाओं की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है। आप उनसे फेसबुक पर जुड़ सकते हैं।

प्रस्तुति: मोईनुद्दीन चिश्ती (देश के वरिष्ठ लेखक- पत्रकार हैं और अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए ख़ासे लोकप्रिय हैं)

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MOINUDDIN RBS CHISHTY
लेखक स्वतंत्र कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं। वे अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए देशभर में लोकप्रिय हैं।

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