Home आयुर्वेदनामा आयुर्वेदनामा: अत्यंत गर्म और तीखे स्वभाव की वनस्पति ‛चित्रक’

आयुर्वेदनामा: अत्यंत गर्म और तीखे स्वभाव की वनस्पति ‛चित्रक’

आज आयुर्वेदनामा में हम चित्रक के बारे में जानकारी हासिल करेंगे जो मुख्य रूप से पहाड़ी स्थानों व जगलों में पाया जाने वाला बहुवर्षीय झाड़ीदार औषधीय पौधा है। यह पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, दक्षिण भारत, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, खासिया पहाड़, सिक्किम, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों में पाया जाता है।

इसका वानस्पतिक नाम ‘पलमबैंगो जिलेनिका’ है एवं पलमबोजीनेसी परिवार का पौधा है। चित्रक का मूल निवास दक्षिण एशिया के वन हैं।

इस पादप के सभी भागों का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है, लेकिन इसकी जड़ व तने में सबसे अधिक सक्रिय जैव यौगिक पाए जाते हैं। भारत में चित्रक वनौषधि के रूप में मध्य भारत से पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और दक्षिणी भारत के विभिन्न हिस्सों में फैला हुआ है।

भारत में अलग-अलग भाषाओं में इस पौधे के कई नाम हैं, जैसे हिंदी में चित्रक/चिरमूल, संस्कृत में चित्रा, कन्नड़ में चित्रमूला, मलायलम में चित्रकमुला/बिलिचितरामुला, पंजाबी में वेलेडेडुवेली, बंगाली में चित्रा, तमिल में चिता और तेलुगु में कोडीवली/चित्रमूलम आदि।

चित्रक लगभग आंध्र प्रदेश के मैदानी इलाकों में जंगली या खेती में आमतौर पर उगता है। भारत में इसकी श्वेत पुष्प, लाल पुष्प और नीला पुष्प की तीन जातियां पायी जाती हैं, जिसमें श्वेत व लाल पुष्प चित्रक की उपलब्धता के कारण इसका प्रयोग औषधि में ज्यादा किया जाता है।

इसका पौधा जमीन से 5-7 फुट ऊंचा होता है इसका तना गोल, पतला व हल्के भूरे रंग का होता है। पत्ते एकांतर, तीन इंच लंबे, 1.5 इंच चौड़े व हरे रंग का होता है। पुष्प गुच्छों में पुष्पदंड चार से 12 इंच लंबा अजेक शाखा से युक्त श्वेत या लाल रंग के होते हैं। शीतकाल सितंबर से नवंबर माह में लगते हैं। पुष्प रोएदार होते हैं, फल शिम्बी के जैसा लंबा व गोल होता है। फल के अंदर एक लंबा बीज होता है। जड़ मोटी व गुच्छे में होती है, बाहर से भूरा व अंदर से सफेद रंग का होता है।

चित्रक को तना कटिंग एवं बीज के माध्यम से प्रसारित किया जाता है। इसके बीजों से बुवाई करने पर 15-20 दिन में नए पौधे उग आते हैं। इस पादप की जड़ में एक उच्च कोटि का ‘प्ल्म्बेगिन’ नामक रसायन पाया जाता है, जिसका उपयोग औषधि निर्माण में किया जाता है।

यह अत्यंत ही गर्म और तीखे स्वभाव की वनस्पति है, जिसे आयुर्वेद में कफ़ एवं वात दोष का शमन करने वाली श्रेष्ठ औषधि माना गया है। इसकी जड़ों की क्षाल का प्रयोग जननेन्द्रियों को उत्तेजित करने में किया जाता है। यदि भूख कम लगने जैसी परेशानी हो तो इसे श्रेष्ठ अग्निदीपक माना गया है।
यह पौधा त्वचा रोग को नष्ट करता है। यह जोड़ों के दर्द, उल्टी, घाव, खुजली आदि में बहुत उपयोगी माना गया है।

भारत एवं विश्व में हुए चित्रक पर शोध परिणामों से पता चला है कि औषधीय और जैविक गतिविधियों में यह मलेरिया रोधी, एंटी ओबेसेस, एंटीऑक्सिडेंट, अल्सर रोधी और रोगाणुरोधी के उपचार में आशाजनक गतिविधियों को प्रदर्शित करता है।

चित्रक की जड़ में उपस्थित फाइटोकेमिकल यौगिकों भविष्य में दवा की स्वदेशी प्रणाली में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।आयुर्वेदाचार्य या विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही इस पौधे का उपयोग करें।

प्रस्तुति: आशीष कुमार (लेखक सीएसआईआर, केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप)अनुसंधान केंद्र, बोदुप्पल, हैदराबाद में कार्यरत हैं)

संपादन: मोईनुद्दीन चिश्ती

आशीष कुमार
आशीष कुमार
लेखक सीएसआईआर, केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप)अनुसंधान केंद्र, बोदुप्पल, हैदराबाद में कार्यरत हैं।

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