Home आयुर्वेदनामा आयुर्वेदनामा: कड़वाहट का राजा यानी ‛कालमेघ’

आयुर्वेदनामा: कड़वाहट का राजा यानी ‛कालमेघ’

आज आयुर्वेदनामा में हम कालमेघ के बारे में जानकारी हासिल करेंगे जो एक बहुवर्षीय शाक जातीय औषधीय पौधा है।

कालमेघ को यवतिक्त, शंखिनी, महातीता आदि नामों से जाना जाता है। कालमेघ को वानस्पतिक भाषा में ‘एंडोग्रेफिस पैनिकुलाटा’ कहा जाता है। इसका स्वाद तीखा और पेड़ नीम से मिलता जुलता है, इसलिए इसे भूनिम्ब के नाम से भी जाना जाता है।

कालमेघ के पौधे को हम आमतौर पर ‘किंग ऑफ बिटर’ अर्थात ‛कड़वाहट का राजा’ नाम से भी जानते हैं। क्योंकि इसका स्वाद अत्यधिक कड़वा होता है।

कालमेघ को बीजों अथवा तना कटिंग के माध्यम से घरों एवं घर के आस-पास खाली पड़े स्थानों पर उगाया जा सकता है, जिसकी ऊंचाई 30 से 75 सेमी तक होती है। इसके फूल गुलाबी रंग के होते हैं।

कालमेघ का औषधीय महत्त्व इसके सभी (पत्ती, पुष्पक्रम और तना) भागों में पाया जाता है। कालमेघ में मिलने वाले एंड्रोग्रैफोलॉईड के अनेक प्रकार के वायरस के विरुद्ध उपयोगी होने के प्रमाण विभिन्न स्तरों पर मिले हैं।

कालमेघ पर देश में सबसे प्रभावी शोध भारत सरकार के वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अंतर्गत केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप), लखनऊ में हो रहा है। देश में उपलब्ध कालमेघ की जैविक विविधता को संकलित कर आनुवंशिक आकलन के आधार पर एक उन्नत नई किस्म ‘सिम-मेघा’ विकसित की गई है, जो वांछित औषधीय गुणों से युक्त है।

कालमेघ वनों में जंगली पौधे के रूप में पाया जाता है तथा सीमैप द्वारा इसकी औषधीय उपयोगिता को देखते हुए इसकी कृषि तकनीक विकसित की गई है और इसकी खेती को प्रचलन में लाया गया है। कालमेघ की खेती के लिए बीज प्रवर्धन सबसे उपयुक्त है।

बीज द्वारा 10-30 मई के मध्य नर्सरी करना सर्वोत्तम रहता है। एक हेक्टेयर में कालमेघ लगाने के 250 ग्राम बीज, 10 मीटर लंबी तथा 2 मीटर चौड़ी तीन क्यारियों में बीज को बोते हैं। इसके बीजों का अंकुरण 5-7 दिनों बाद प्रारंभ हो जाता है।

कालमेघ की नर्सरी तैयार करने के लिए किसी छायादार स्थान का चुनाव करना अच्छा रहता है क्योंकि मई और जून की तेज धूप से पौध को बचाया जा सके। बुवाई के 10-15 दिन बाद आवश्यकतानुसार समय-समय पर पौध तैयार होने तक क्यारियों में भरकर पानी देना चाहिए।

भारत एवं विश्व में हुए कालमेघ पर शोध परिणामों से पता चला है कि कालमेघ वाइरसरोधी, जीवाणुरोधी, एन्टीकैंसर, एन्टीइन्फ्लेमेटरी, एन्टीपैरासाइटिक, एन्टीडायबेटिक, एन्टीकार्सिनोजेनिक आदि गुणों से भरपूर है।

कालमेघ का उपयोग दमा, ज्वर, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, खांसी, गले में छाले, अतिसार, पाइल्स और भगन्दर इत्यादि रोगों के निवारण में लाभकारी पाया गया है।

बुजुर्गों के लिए कालमेघ मधुमेह रोधी का काम करता है, यह शरीर में ग्लूकोज चयापचय को बढ़ा देता है। यह सत्त्व धीमे पाचन एवं आंत्र जलन के लिए उपयोग किया जाता है। यह अनेक चर्म रोग, स्कैबीस, बुखार, मलेरिया, श्वसन सक्रमण, जॉन्डिस व अन्य लीवर संबंधित विकारों में भी उपयोग में लाया जाता है।

आयुर्वेदाचार्य या विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही इस पौधे का उपयोग करें।

संपादन: मोईनुद्दीन चिश्ती

आशीष कुमार
आशीष कुमार
लेखक सीएसआईआर, केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप)अनुसंधान केंद्र, बोदुप्पल, हैदराबाद में कार्यरत हैं।

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