Home आयुर्वेदनामा आयुर्वेदनामा: अस्‍थमा के उपचार सहित विभिन्न रोगों में कारगर है ‛दमबेल’

आयुर्वेदनामा: अस्‍थमा के उपचार सहित विभिन्न रोगों में कारगर है ‛दमबेल’

दमबेल का उपयोग पारंपरिक रूप से अस्थमा के लिए बहुत लोकप्रिय इलाज है। दमबेल का वानस्पतिक नाम टाइलोफोरा इंडिका है। यह एसक्लीपिएडेसी कुल का पौधा है। दमबेल को कई लोग लताक्षीरी या दमबूटी के नाम से भी जानते हैं। दमबेल एक बारहमासी पौधा है, जिसका मूलस्थान दक्षिणी एवं पूर्वी भारत के मैदानी क्षेत्र, वन और पहाड़ियां हैं।

यह एक सदाबहार चढ़ने वाली झाड़ीनुमा लता है। इस पौधे की झाड़ी की लंबाई 1.5 से 2 मीटर तक ऊंची हो सकती है। इसकी पत्तियां अंडाकार होती हैं, जो 3-10 सेंमी लंबी और 1.5–7 सेमी चौड़ी होती हैं। इसके फूल छोटे एवं दिखने में छतरी की तरह होते हैं। इसके फल 7 सेमी तक लंबे होते हैं। दमबेल को बीज एवं स्टेम कटिंग द्वारा प्रसारित किया जा सकता है।

दमबेल समस्त भारत में मुख्यत पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, मध्यप्रदेश, बिहार, उड़ीसा एवं दक्षिण भारत के राज्यों में लगभग 1000 मीटर की ऊंचाई तक पाई जाती है।

दमबेल अद्वितीय औषधीय पौधा है, जिसकी जड़ें एवं पत्तियां उपयोग में ली जाती हैं। दमबेल की लता से न केवल अस्‍थमा का उपचार कर सकते हैं, बल्कि यह श्‍वसन पथ जैसे ब्रोंकाइटिस और काली खांसी संक्रमण के इलाज के लिए भी उपयोगी है।

भारत एवं विश्व में दमबेल पर हुए अभी तक के शोधों से पता चला है कि इस पौधे के अलग-अलग भागों में एंटी-दमा, जीवाणुरोधी, एंटी-सोरायसिस, रोगाणुरोधी, एंटीएलर्जिक, एंटीडायरेगियल, हाइपोलिपिडेमिक और डिसियोलिओटिक गुण हैं।

एंटीडायबिटिक, हेपेटोप्रोटेक्टिव, एंटीजेनोजेनिक, एंटी-ट्यूमर, एंटीऑक्सिडेंट, एंटीकॉन्वल्सेंट, एंटी-रूमैटिक, और मूत्रवर्धक गतिविधियों को भी कई सक्रिय फाइटोकेमिकल्स जैसे एल्कलॉइड, सैपोनिन, फाइटोस्टेरोल, टैनिन, टेरपेनोइड्स प्राथमिक की वजह से एक बहुउपयोगी औषधीय पौधे के लिए जाना जाता है।

अस्थमा सहित प्रमुख बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए हर्बल दवाओं के उपयोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है। दमबेल कई आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल होने वाला एक महत्वपूर्ण एंटीस्टेमैटिक औषधीय पौधा है।

दमबेल पौधे की व्यावसायिक और औद्योगिक उपयोगिता को शोध एवं प्रमाण आधारित दवाएं विकसित करने की आवश्यकता है, जिससे आमजन को इस औषधीय पौधे के बारे में जानने की जिज्ञास बढ़ेगी।

आयुर्वेदाचार्य के परामर्श से ही इस पौधे का उपयोग किया जाना चाहिए।

संपादन: मोईनुद्दीन चिश्ती

आशीष कुमार
आशीष कुमार
लेखक सीएसआईआर, केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप)अनुसंधान केंद्र, बोदुप्पल, हैदराबाद में कार्यरत हैं।

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