Home Inspiration संघर्ष की कहानी : बस कंडक्टर एवं अखबार बेचकर 'जज' बना विधायक...

संघर्ष की कहानी : बस कंडक्टर एवं अखबार बेचकर ‘जज’ बना विधायक का बेटा !

खुदी को कर इतना बुलंद की हर तक़दीर से पहले खुदा खुद बन्दे से पूछे की तेरी रज़ा क्या हैं…

यह पंक्तियाँ इस युवा पर सटीक बैठती हैं. पिता विधायक थे लेकिन किस्मत ने ऐसा पलटा मारा कि अखबार बेचने को मजबूर होना पड़ा. अपने ही घर से बेदखल होकर किराए के मकान में रहना पड़ा. बहनों की जिम्मेदारी उठाने के लिए बस में परिचालक से लेकर मेडिकल स्टोर में हेल्पर का काम किया.

तमाम कठिनाइयों एवं संघर्षों के बावजूद इस शख्स ने कड़ी मेहनत को अपना साथी बनाया. आजीविका के लिए छोटे-मोटे काम करते हुए भी पढाई जारी रखी और आज वो उत्तरप्रदेश में जज बन गए हैं. संघर्षों का दूसरा नाम है दिव्य प्रताप सिंह निमेष (Divya Pratap Singh Nimesh).

इनकी कहानी पूरी फ़िल्मी है लेकिन किरदार सारे असली है. विधायक का बेटा होना, माँ की असामयिक मौत, चाचा की हत्या होना. इसके बाद घर-परिवार बसाने के लिए पिता का चाची के साथ पुर्नविवाह और इसके बाद पिता की मौत और इसके बाद चाची का अत्याचार एवं उत्पीड़न . इतना सब होने के बाद घर छोड़ना और संघर्षों के बाद वो पद हासिल करना जिसके लिए लोग समाज में तरसते है. यह सब हुआ है उत्तर प्रदेश के मेरठ निवासी दिव्य प्रताप सिंह निमेष के साथ.

बी पॉजिटिव इंडिया से बातचीत में दिव्य प्रताप सिंह निमेष बताते है कि ​उनके पिता हेमचंद्र निमेष 1980 से 1985 तक सिवालखास से कांग्रेस के टिकट पर विधायक रहे हैं. दिव्य प्रताप जब छह साल के थे तभी उनकी मां चल बसी. इसी बीच उनके चाचा की हत्या हो गयी.

उनके पिता ने अपनी संतानों को माँ का प्यार देने के लिए जबकि अपने भाई की संतानों को पिता का प्यार देने के लिए परिवार की आपसी रजामंदी के बाद उन्होंने अपने भाई की पत्नी से शादी करके घर बसाया. सब कुछ सही चलने की उम्मीद थी लेकिन पारिवारिक कलह बढ़ गया. मानसिक तनाव के चलते जब वह 12 साल के हुए तो पिता का साया भी सिर से उठ गया.

Divya Pratap Singh Nimesh with family
अपने परिवार के साथ दिव्य प्रताप सिंह निमेष | तस्वीर साभार : फेसबुक

अब 12 साल के निमेष पर खुद उनकी और दो बहनों की जिम्मेदारी थी. मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से तंग आकर घर से भाग गए. इस परिस्थिति में उन्होंने अपनी बहनों को ताऊजी के यहाँ पर छोड़ा. आजीविका चलाने के लिए कई काम किये जिनमे ट्रक और बस में हेल्पर, मेडिकल शॉप में काम से लेकर अनगिनत काम किये. संघर्ष के इस दौर में उनकी मदद के लिए मामा ने हाथ आगे बढाए. परिवार की चिंताओं के चलते उनकी पढ़ाई छूट चुकी थी लेकिन फिर से उन्होंने पढने का निश्चय किया. पिता के दोस्तों के साथ ही उनके साथियों ने भी मदद की.

अपने पिता के दोस्त करण सिंह से उन्हें सहारा मिला और दसवीं एवं बारहवीं की पढ़ाई कर सुभारती कॉलेज ऑफ़ लॉ से एलएलबी पूरी की. इसके बाद CLAT की परीक्षा पास करके उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ कॉलेज से एलएलएम में एडमिशन ले लिया. इसके बाद उन्होंने पांच बार UGC नेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण की.

धीरे धीरे जिंदगी की गाड़ी चल निकली तो छोटी मोटी नौकरी भी शुरू कर दी. इसके बाद दोनों बहनों को साथ ले आए और उन्हें भी पढ़ाने लगे और खुद भी तैयारी शुरू कर दी. पिछले चार साल से वह अध्यापन के क्षेत्र में हैं और वर्तमान में आईएएमआर लॉ कॉलेज, दुहाई में कार्यरत हैं.

Divya Pratap Singh Nimesh with family
अपने परिवार के साथ दिव्य प्रताप सिंह निमेष | तस्वीर साभार : फेसबुक

नौकरी के साथ भी पीसीएस की तैयारी जारी रही. उन्होंने पीसीएस जे की परीक्षा में सफलता हासिल की. उनकी एक बहन भी पीसीएस की तैयारी कर रही है जबकि दूसरी एलएलबी की पढ़ाई कर रही है. अपनी सफलता का श्रेय निमेष अपनी दोनों बहने मोनिका और रितु, पत्नी ज्योति, अपने बेटे दिव्यांश और पिता के दोस्त करण सिंह के साथ ही सुभाष चंद्र (ताऊ जी), सुशीला देवी (ताईजी), आनंद स्वरुप (मामाजी), सुनीता देवी (मामीजी) और अपने दोस्त सुनीत कुमार द्विवेदी को देते हैं.

निमेष आगे बताते हैं कि उन्होंने जीवन में बहुत मुश्किल वक्त देखा है, एक दौर में उन्हें अपने परिवार का पेट पालने के लिए उसी जगह अखबार बेचने पड़े जहां उनके पिता विधायक हुआ करते थे. पढ़ाई के दौरान ही बस पर हेल्पर की नौकरी भी की. जीवन में कभी कोई काम छोटा नहीं समझा, जो मिला करते रहे और आगे बढ़ते रहे. आज जी तोड़ मेहनत से वो मुकाम हासिल कर लिया जहां पहुंचने की इच्छा हर व्यक्ति की होती है.

बी पॉजिटिव इंडिया, दिव्य प्रताप सिंह निमेष को सफलता पर बधाई देता हैं और भविष्य के लिए शुभकामनाए देता हैं.

Avatar
News Deskhttps://www.bepositiveindia.in
युवाओं का समूह जो समाज में सकारात्मक खबरों को मंच प्रदान कर रहे हैं. भारत के गांव, क़स्बे एवं छोटे शहरों से लेकर मेट्रो सिटीज से बदलाव की कहानियां लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read

आयुर्वेदनामा: अत्यंत गर्म और तीखे स्वभाव की वनस्पति ‛चित्रक’

आज आयुर्वेदनामा में हम चित्रक के बारे में जानकारी हासिल करेंगे जो मुख्य रूप से पहाड़ी स्थानों व जगलों में पाया जाने...

कैरियर लैब: जनसहयोग से ले रही है आकार, ग्रामीण परिवेश के बच्चें भरेंगे उड़ान !

आपने लैब के बारे में तो अवश्य ही सुना होगा। अस्पतालों में भी जांच करने के लिए लैब या लैबोरेटरी होती हैं।...

ऋचा और फ़ाएज़: कॉफ़ी ही नहीं पिलाते, युवाओं को मंच भी प्रदान करते हैं

यह कहानी है जोधपुर में रहने वाली महिला उद्यमी ऋचा शर्मा की, जिन्हें बचपन से किताबों से लगाव था। बातचीत के दौरान...

प्रधानाध्यापिका की पहल ने बदली स्कूल की तस्वीर, गांव के सहयोग से करवा डाले 10 लाख के विकास कार्य

जहाँ चाह है, वहां राह है . . . यह पंक्तियाँ एक सरकारी स्कूल की प्रधानाध्यापिका पर सटीक बैठती...

आयुर्वेदनामा: कड़वाहट का राजा यानी ‛कालमेघ’

आज आयुर्वेदनामा में हम कालमेघ के बारे में जानकारी हासिल करेंगे जो एक बहुवर्षीय शाक जातीय औषधीय पौधा है।