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डॉक्टर दंपति इलाज के साथ कर रहे है पर्यावरण सरंक्षण, 3 सालों में 30,000 फलदार पौधे मरीजों को बांटें

झारखंड के गिरिडीह जिले के राजधनवार प्रखंड में डॉ अंजू जहां अपनी ‛सूर्या क्लिनिक’ पिछले 12 वर्षों से चलाते हुए इलाके के लोगों को 24 घण्टे चिकित्सकीय सेवाएं दे रही हैं, वहीं पिछले 3 सालों से वे अपने डॉक्टर पति नीरज कुमार जैन के साथ मिलकर30,000 से ज्यादा फलदार पौधे मरीजों और उनके परिजनों को निःशुल्क वितरित कर चुकी हैं।

यूं तो झारखंड पेड़-पौधों और वन क्षेत्र के मामले में सम्पन्न रहा है। वर्तमान में 27% जमीन पर जंगल हैं, फिर भी बढ़ती आबादी और संसाधनों की कमी को देखते हुए पेड़ लगाने की और जरूरत है।

मरीज़ों को पौधें बाँटती डॉ. अंजु

लगातार एक ही इलाके के मरीजों को देखते हुए डॉ अंजू और और डॉ नीरज ने पाया कि महिलाओं और बच्चों में पोषण की भारी कमी है। अधिकांश महिलाओं में खून और कैल्शियम की कमी होती है, जिस कारण उनके नवजात बच्चों में भी कुपोषण का खतरा बना रहता है।

महिलाओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि उनके भोजन में किसी भी तरह का कोई फल शामिल नहीं होता, वहीं डॉ अंजू मरीजों को गर्भधारण की शुरुआत से ही पर्याप्त मात्रा में फल खाने के लिए प्रेरित करती हैं।

बातचीत करने पर यह भी पता चलता है कि फलों का महंगा होना भी एक कारण है, जिस वजह से वे उनकी पहुंच से दूर हैं।
इस पर डॉ नीरज कहते हैं,“किसी भी इंसान के भोजन में यदि एक तिहाई हिस्सा फलों का हो जाए तो 50% बीमारियां चुटकी बजाते ही गायब हो जाएंगी।

पौधों के साथ महिलाएँ

यदि फलदार पेड़ सबके घरों में हों तो क्या बात हो! एक तरफ जहां सबको फल मिलेंगे, वहीं पर्यावरण भी अच्छा रहेगा! परिणामस्वरूप लोग बीमार कम होंगे और भावी पीढ़ियां स्वस्थ पैदा होंगी! पर यह मात्र एक कल्पना है पर इस चिकित्सा के नोबल पेशे से जुड़े इस युगल ने इसकी शुरुआत अपने स्तर पर कर दी है!

हर महीने बाह्य रोगी विभाग में आने वाले मरीजों के बीच वे लगभग 1000 पौधे वितरित कर देते हैं, वह भी पूर्णतः निःशुल्क।

और तो और, नवजात के जन्म के पश्चात जब वह अपनी मां के साथ पहली बार अपने घर का रुख करता है तो उसे उपहार स्वरूप अमरूद, अनार, शरीफा और कटहल के पौधे दिए जाते हैं। बाद में इन्हीं पौधों को उसके नाम से रोपित कर घरवालों द्वारा उन्हें पेड़ बनाने का संकल्प दिलवाया जाता है। वैसे यहां सबकी पहली पसंद अमरूद का पौधा ही होता है।

महिला मरीज़ के साथ डॉ. अंजु

इस क्षेत्र में कटहल और शरीफा के पेड़ तो पहले से ही हर गांव में हैं, लेकिन अमरूद के पेड़ न के बराबर हैं। इस जनजागृति से यह बदलाव देखने को मिला कि, अब तो आने वाले हर मरीज बिना पौधे के लौटते ही नहीं हैं।

डॉ नीरज और डॉ अंजू की इस जोड़ी ने साल 2000 में एमबीबीएस की पढ़ाई बिहार के अनुग्रह नारायण मेडिकल कॉलेज, गया, बिहार से की थी। साल 2002 से यह जोड़ा अपनी अमूल्य सेवाएं झारखंड के गिरिडीह जिले में दे रहा है।डॉ जैन राजधनवार रेफरल हॉस्पिटल में पदस्थापित हैं।

अपने पिछले 3 साल के अनुभव को लेकर डॉ अंजू बताती हैं,“फलदार पौधे लगाने की इच्छा हर किसी के मन में है, पर कई बार पौधों की समुचित उपलब्धता नहीं हो पाती।

बहुत सी महिलाओं ने बताया कि उनके पहले बच्चे के नाम पर लगाए पौधे अब पेड़ बन चुके हैं, उनमें फल आ चुके हैं। इस बीच कई परिवारों में जब दूसरे बच्चे का जन्म हुआ तो फिर से परिवार ने बच्चों के नाम पर पौधे लगाए हैं।

झारखंड में आबादी का घनत्व कम है इसलिए हर किसी के पास पौधे लगाने के लिए पर्याप्त मात्रा में जगह उपलब्ध है।
चूंकि महिलाएं स्वाभविक रूप से हर चीज को सहेजना जानती हैं, इसलिए क्लीनिक से निःशुल्क मिले इन पौधों को अपने संतान की तरह सहेजकर पौधे से पेड़ बना ही लेती हैं।

लॉकडाउन के दौरान भी सेवा रही जारी

अक्सर ऐसा भी देखा गया कि पौधे के घर पहुंचते ही वह घर की पूंजी बन गया और पूरा परिवार उसकी देखभाल में जुट गया।

डॉ नीरज भी यदा कदा सरकारी अस्पताल में आए अपने मरीजों को पौधे देते हैं। इस युगल की पहल से जाने अनजाने ही सही पर इलाके का हर परिवार फलदार पौधों से जुड़ता जा रहा है। धन्यवाद के पात्र हैं ऐसे अनोखे चिकित्सक दंपति।

प्रस्तुति: मोईनुद्दीन चिश्ती (देश के वरिष्ठ लेखक- पत्रकार हैं और अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए ख़ासे लोकप्रिय हैं)

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MOINUDDIN RBS CHISHTY
लेखक स्वतंत्र कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं। वे अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए देशभर में लोकप्रिय हैं।

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