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पग-पग पर संघर्ष कर बने डॉक्टर, आदिवासी इलाकों में मुफ्त इलाज़ करके निभा रहे अपनी जिम्मेदारी

मुझे ऊंचाइयों पर देखकर हैरान हैं बहुत लोग ।
पर किसी ने मेरे हाथों एवं पैरों के छाले नहीं देखे ॥

यह पंक्तियाँ छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के आदिवासी इलाके से आने वाले एक डॉक्टर पर सटीक बैठती है. घर पर आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबधी समस्याए थी. पिता ने मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या की तो परिवार की जिम्मेदारी के कारण पढ़ना मुश्किल रहा.

मुश्किल परिस्थितियों में कॉलेज के प्रोफेसर और दोस्तों ने साथ दिया. पग-पग पर संघर्ष किया लेकिन अंतत: डॉक्टर बन ही गए. अब आदिवासी इलाकों में मुफ्त इलाज़ करके अपनी जिम्मेदारी निभाना चाहते है, संघर्ष एवं उसके बाद मिली सफलता का दूसरा नाम है डॉ. जैनेन्द्र कुमार शांडिल्य.

डॉ. जैनेन्द्र कुमार शांडिल्य आदिवासियों के मुफ्त इलाज के साथ ही छत्तीसगढ़ की तस्वीर बदलने के लिए लगे हुए हैं. पढाई के दौरान मिले समय में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करके उसी खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद किया और यूट्यूब के जरिये लोगो तक पहुंचा रहे हैं.

वो मानते हैं कि बस्तर कि पहचान “नक्सलवाद” नहीं बल्कि “प्राकृतिक सुंदरता” है. अब डाक्टर बनने के बाद नक्सल प्रभावित क्षेत्र में गरीब ,असहाय और जरूरतमंदो के लिए मुफ्त में इलाज करना चाहते हैं.

बी पॉजिटिव इंडिया से बातचीत में डॉ. जैनेन्द्र कुमार शांडिल्यबताते हैं कि घर में आर्थिक और मानसिक परेशानी थी. बचपन बहुत ही मुश्किलों में गुजरा. मेहनत-मजदूरी कर जरूरतें पूरी की. हमारे क्षेत्र के लिए किसी के नाम के आगे डाक्टर टाइटल लग जाना बहुत मुश्किल हैं. इस मुकाम तक पहुंचना मेरे लिए बहुत ही कठिन सफर रहा.

अपने गांव में डॉ. जैनेन्द्र

मेरा जन्म छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित एवं बस्तर संभाग के आदिवासी क्षेत्र धमतरी जिले के भीतररास – सिहावा गांव में हुआ. पिता शिक्षक थे लेकिन घर के हालत अच्छे नहीं थे. दादाजी की मृत्यु जल्दी हो जाने के कारण पिता पर उनके 3 भाई और 2 बहन समेत पुरे परिवार की जिम्मेदारी थी. घर में लगभग 15 सदस्य थे और खेती-बाड़ी एवं पिताजी की नौकरी से बमुश्किल गुजरा हो पाता था. रहने के लिए कोई बड़े घर की व्यवस्था नहीं थी तो आधा परिवार किराया के मकान में रहता था.

आर्थिक तंगी को तो हम संभाल रहे थे लेकिन घर में किसी ना किसी एक इंसान की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहती थी. गांव के लोग इसे अपने शब्दों में इसे भूत-प्रेत का साया कहते और झाड़ फूंक कराते थे लेकिन कोई आराम नहीं मिलता था. समाज के दबाव और मेरे परिवार-जन को पागल कह कर चिढ़ाया जाता था. कभी-कभी हालात इतने नाजुक हो जाते थे कि उन्हें जंजीर से बांधना पड़ता. लेकिन परिवार में झाड़ फूंक से ही काम चल रहा होता था.

इन परिस्थितयों में मैंने गांव के ही सरकारी स्कूल में पढाई शुरू की और घर के हालात के चलते कभी भी सुविधाए नहीं रही. दो जोड़ी कपड़े और कॉपी-किताबे के अलावा मेरी कोई मांग नहीं रहती थी. पढाई में ठीक ठाक था तो काम चल जाता था.

आदिवासी इलाके से आते है डॉ. जैनेन्द्र

8वी पास होने के बाद थोड़ा समझदार हो चुका था और घर के लिए बोझ नहीं बनना चाहता था. खेती-किसानी में परिवार का हाथ बंटाने लगा.चाचा और दोस्तों के साथ मेहनत मजदूरी करता था. लकड़ी का काम, मिस्त्री काम या जो भी मजदूरी मिले. उस समय एक दिन की मजदूरी के 70 रुपए मिलते थे.

ऐसे ही मैंने 10वी 62 प्रतिशत से पास की. दिमाग में बहुत कुछ चलता रहता था क्योंकि घर की परेशानियां मुझे खाए जाती थी. कोई मेरे चाचा को पागल कहता था तो कोई चोर कहता था तो कोई कुछ और. ऐसा कभी विचार नहीं था कि मुझे डाक्टर बनना है. क्योंकि छोटे से गांव में इतनी परेशानियों की वजह से मेरी सोच सीमित रह गई थी और कोई मार्गदर्शन देने वाला भी नहीं था.

पिताजी के कहने पर 11वी में विज्ञान विषय में पढ़ाई करना शुरू कर दिया. ऐसे ही खेती-किसानी एवं मेहनत-मजदूरी और घर की समस्या के साथ सब चलता रहा और मैं 12वी में 51 प्रतिशत से पास हुआ. 12वी के बाद मुझे डाक्टर बनने के लिए कोचिंग के लिए भेजा गया.

पहली बार घर से दूर में मेडिकल कालेज में जाने के लिए की PMT तैयारी करने लगा. एक किराए के मकान में रहता और खुद खाना बनाता और पढ़ाई करता था. पहले साल मेरा चयन नहीं हो पाया क्योंकि आधा से ज्यादा समय मुझे बाहर शहर के माहौल में ढलने में लग गया. उधर घर में मानसिक बीमारी ने मेरे चाचा – बुआ की जान ले ली.

आदिवासी इलाके के बाजार में डॉ. जैनेन्द्र

इस ख़राब दौर में जैसे तैसे मैंने मेहनत करने के बाद मेरा चयन 2011 में स्व. बलिराम कश्यप स्मृति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, जगदलपुर (बस्तर) में हुआ. पर यहां भी परेशानी ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा . अंग्रेजी भाषा के साथ खास दुश्मनी थी. मुझे पढ़ने और लिखने में बहुत दिक्कत हुई. पढाई के दौरान ही मानसिक परेशानी और स्कूल के तनाव की वजह से मेरे पिता ने भी आत्महत्या कर ली.

पिताजी के चले जाने के बाद 3 साल पुरे परिवार के लिए बहुत मुश्किल रहे. मेरी पढ़ाई की फीस जमा करने के लिए भी पैसे नहीं थे तो मेरे कालेज के कुछ शिक्षकों ने मेरी मदद की. दैनिक खर्चे के लिए मेरे बैच के दोस्त मिलकर मुझे हर महीने 5000 देकर एक साल तक मेरी मदद की.

मेरे लिए ये चुनौती का समय था क्योंकि लोगों को लगता था कि यही मानसिक तनाव कहीं मुझे भी ना खा जाए. एक डाक्टर बनने वाला था तो तब तक मुझे समझ आ चुका था कि परेशानी क्या है – हम जिंदगी को बोझ बना के जीते हैं और शराब का साथ लेने लगते हैं. इस समय लोग ज्यादा गलतियां करते हैं. सब परेशानियों के बावजूद खुश रहते हुए संघर्ष करने का निर्णय लिया.

डॉक्टर बनने के बाद मैंने लोगों की मदद करना शुरू किया एवं जरूरतमंद लोगो की चिकित्सीय सहायता देने लगा. दूसरों को खुश देख मुझे खुशी होती थी.

फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी का शौक है डॉ. जैनेन्द्र को

मुझे फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करना अच्छा लगता था तो मैंने अपने You Tube Channel – Dr. Jainendra Kumar Shandilya में शुरुआत की. बस्तर नक्सलवाद के लिए नहीं बल्कि बस्तर प्राकृतिक जंगल, झील, झरने, नदिया, पहाड़ और घाटियों के लिए प्रसिद्ध है. वीडियो बनाकर बस्तर की सुंदरता को दिखाने की कोशिश की. लोगों ने इसे काफी पसंद किया और में इसे आगे बढ़ाना चाहता हूं. सिर्फ बस्तर ही नहीं बल्कि पूरी भारत कि सुंदरता खोजने की कोशिश करूंगा.

अगर आप भी डॉ. जैनेन्द्र कुमार शांडिल्य से जुड़ना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करे !

बी पॉजिटिव इंडिया, डॉ. जैनेन्द्र कुमार शांडिल्य के संघर्षों को सलाम करता हैं और छत्तीसगढ़ एवं खासकर बस्तर संभाग के लोगो का मुफ्त में इलाज़ करने के पुनीत कार्य की प्रशंसा करता हैं.

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News Deskhttps://www.bepositiveindia.in
युवाओं का समूह जो समाज में सकारात्मक खबरों को मंच प्रदान कर रहे हैं. भारत के गांव, क़स्बे एवं छोटे शहरों से लेकर मेट्रो सिटीज से बदलाव की कहानियां लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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