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आयुर्वेदनामा: जानते हैं गुग्‍गल के बारे में, विलुप्ति की कगार पर है यह प्रजाति

गुग्‍गल एक बहुवर्षीय औषधीय छोटा पेड़ है जिसका वानस्पतिक नाम कमिफोरा मुक्कल है, जो बुरसेरासै कुल के अन्तर्गत आता है। गुग्‍गल के पत्‍ते छोटे और एकान्‍तर सरल होते हैं। यह सिर्फ वर्षा ऋतु में ही वृद्धि करता है तथा इसी समय इस पर पत्‍ते दिखाई देते हैं।

शेष समय यानि सर्दी तथा गर्मी के मौसम में इसकी वृद्धि अवरूद्ध हो जाती है तथा यह पर्णहीन हो जाता है। सामान्‍यत: इसका पेड़ 3-4 मीटर ऊंचा होता है, इसके तने से सफेद रंग का दूध निकलता है, जो इसका एक उपयोगी भाग है।

प्राकृतिक रूप से गुग्‍गल भारत के कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, गुजरात तथा मघ्‍यप्रदेश जैसे राज्यों में उगता है। गुग्‍गल उगाने के लिए उष्‍णकटिबंधीय, कम वर्षा तथा शुष्‍क जलवायु वाले क्षेत्र उपयुक्‍त होते हैं। यह अन्‍य छायादार वृक्षों के साथ अधिक वृद्धि करता है। अत: इसे वनों या बगीचों में, खेतों की मेड़ों पर, छायादार पेड़ों के नीचे फेंसिंग के रूप में लगाया जा सकता है।

रेतीली, पहाड़ी मृदा जिसमें जल निथार अच्‍छा हो, इसके लिए उपयुक्‍त है। यह शुष्‍क स्‍थानों में भी अच्‍छी वृद्धि करता है, इसलिए असिंचित क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है।

यह कुछ संयोजन पोषण संबंधी उत्‍पादों का एक घटक है, जिसे कोलेस्‍ट्रोल और ट्राइग्लिसराइड्स के समान चयापचय को मजबूत करने के लिए उपयोग किया जाता है। इनके अन्‍य घटकों में इनोसिटोल हैक्‍साइनासिनेट, क्रोमियम, विटामिन और एंटीऑक्‍सीडेंट भी होते हैं।

औषधीय और जैविक गतिविधियों में यह एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है और यही कारण है कि यह कई गंभीर बीमारियों में एक बेहतर औषधि साबित होता है।

मुंह के छालों, मुहांसों, त्वचा के रोगों, मुंह पर अधिक तेल आने में गुग्‍गल लेने पर सुधार आता है। गुग्‍गल का धुव सुगन्धित एवं कीटनाशीनाशक होता है, इसलिए इसका उपयोग धुप एवं अगरबत्ती में किया जाता है। इन सबके अलावा गंजेपन, थायराइड के रोगों और तंत्रिका तंत्र के रोगों को ठीक करने में भी गुग्‍गल सक्षम है।

गुग्‍गल से नि:स्रावित गम रेजिन के रासायनिक घटक इसमें लगभग नमि 6.1% वाष्पशील तेल 0.6%, रेजिन 61%, गोंद 28.3% तथा अन्य बाहरी पदार्थ 3.2% पाए जाते हैं। पूर्णत: संशोधित रेजिन, पतली फिल्म के रूप में प्राय: पारदर्शी होता है।

मरूसुधा गुग्‍गल की एक उन्नतशील किस्म केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) लखनऊ द्वारा विकसित की गई है।

भारत में गुग्‍गल विलुप्‍तावस्‍था के कगार पर आ गया है, अत: बडे क्षेत्रों में इसकी खेती करने की जरूरत है। हमारे देश में गुग्‍गल की मांग अधिक तथा उत्‍पादन कम होने के कारण अफगानिस्‍तान व पाकिस्‍तान से इसका आयात किया जाता है। गुग्‍गल को मुख्य रूप से भारत के राजस्थान और गुजरात राज्यों के शुष्क क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है।

प्रस्तुति: आशीष कुमार (लेखक सीएसआईआर, केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप)अनुसंधान केंद्र, बोदुप्पल, हैदराबाद में कार्यरत हैं)

संपादन: मोईनुद्दीन चिश्ती

आशीष कुमार
आशीष कुमार
लेखक सीएसआईआर, केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप)अनुसंधान केंद्र, बोदुप्पल, हैदराबाद में कार्यरत हैं।

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