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विश्व पर्यावरण दिवस : राजस्थान का सबसे बड़ा जिला, रेत के टीले, पानी का अभाव, हर तरफ बंजर भूमि !

इस बार का पर्यावरण दिवस मनाने से पहले ही पर्यावरण ने खूदब खुद अपनी प्रदूषित विभाओं को नहला दिया़ है। थार का रेगिस्तान, जहां ना तो पानी है और विरली वनस्पति और जीव जन्तु। हमने वहां के पर्यावरण के बारे में जानने की कोशिश की। 

सुदूर पश्चिमी राजस्थान का रेतीले टीलों वाला जिला है जैसलमेर। जहां वर्षा का वार्षिक औसत मात्र 5 सेमी ही है। आबादी का घनत्व बहुत कम, जिसकी अपनी जलवायु, अपना पर्यावरण है। गर्म हवाओं के साथ विस्थापित होते बालु के टीले, दूर दूर तक कोई नजर न आना यहां की विशेषता है। वर्षा जल के संचयन हेतु खड़ीन होती हैं, जो 5-7 खेतों में पानी को रोककर बनाई जाती हैं। वर्षाकाल में नीचली जमीन पर प्लाया झीलें बनती हैं व पानी पीने के लिए लोग अपने घरों पर टांके बनाते हैं। 

जैसलमेर में राजस्थान का राज्य पेड़ खेजड़ी बहुतायत से मिलेगी है। जिसका इंसानी जीवन निर्वाह में बड़ा ही महत्व है। इसकी फलियों को सांगरी, पत्तियों को लूंग कहते हैं जिन्हें पशु खाते हैं। यहां बहुतायत से जाळ होती है जिन पर पीलू फल लगते हैं। जो लू से बचाते हैं। सामान्यत: यहां ऐसी ही जंगली औषधियों से लोग गुजारा कर लेते हैं।

राज्य पुष्प का पेड़ रोहिड़ा, झरबेरी (जिन्हें बोरड़ी कहते हैं) , कंकाड़ी, कुमट, बबूल, कैर, आदि के पेड़ होते हैं। झाड़ियों में आक, खींप, सणिया, बूर, नागफनी, थोर आदि होते हैं। घास कुल में सेवण घास, धामन घास, मोथा, तुंबा, गोखरू, सांठी, दूब आदि होते हैं। ये सारी ऐसी वनस्पतियां हैं जिन्हें ऊंट, बकरी, भेड़ आदि चाव से खाते हैं।

रेगिस्तान में आजीविका का स्रोत पशुपालन है। फसलों में मोठ बाजरा यदाकदा ही होता है। वैसे वर्तमान में कृषि तकनीकी के सहारे किसानों ने फलोद्यान भी स्थापित करने की सफल कोशिश की है।

 रेगिस्तानी मरूदभिद् वनस्पति बहुत कम पानी से जीवन चक्र पूरा कर देती हैं। जड़ें गहरी, तनों पर मजबूत छाल व पत्तियां कांटों के रूप में होती हैं। यहां पर परिवहन व सवारी के लिए रेगिस्तान का जहाज या ऊंट काम में आता है। जो राजस्थान का राज्य पशु है। ऊंट के पैर गद्देदार होने से ये बालु रेत में नहीं धंसते हैं। यह कई दिनों तक बिना पानी पीए ही रह सकता है।

रेगिस्तानी झाड़ियों में गिरगिट, अनेक प्रकार के सरीसृप खासकर पींवणां सांप पाया जाता है। कहते हैं यह सांप सोते हुए लोगों के मुंह के पास आकर जहरीली श्वांस छोड़ता है। हालांकि ऐसा वर्तमान में नहीं होता है। 

जैसलमेर में सम के धोरे सैलानियों को खासा आकर्षित करते हैं। विदेशी पर्यटक ऊंटों की सवारी करने शीतल रातों में रेतीले धोरों पर मध्यम रोशनी व संगीत की ठण्डी धूंनों का आनंद लेने आते हैं। ‘पधारो म्हारे देश’ आज रेगिस्तानी संस्कृति की पहचान बन चुका है। यहां का सोनार का किला ऐतिहासिक खूबसूरती को बयां करता है।

जैसलमेर के सांवता गांव स्थित श्री देगराय माता मंदिर का ओरण 610 वर्ष पुराना है। जहां वृक्ष काटना व काश्त करने पर सदियों से रोक है। ओरण क्षेत्र पशुपालकों की आय का मुख्य चारागाह है, जिस पर लोगों का रोजगार आधारित है। वर्तमान में यह ओरण विभिन्न प्रजातियों के पुराने वृक्षों जैसे खेजड़ी, कुम्भट, रोहिड़ा, देसी बबूल, इत्यादि और विभिन्न मरुस्थलीय झाड़ियों, लताओं आदि का एक सुरक्षित क्षेत्र है। राजस्थान का राज्यपक्षी गोङावण, तितर, हिरण अादि का भी रहने का सुरक्षित क्षेत्र है और ऊंटों के लिये बङा चारागाह यही ओरण है। जिसमें अपना जीवन यापन करते हैं।

ऊंटपालक व देगराय ऊष्ट्र संरक्षण संस्थान के संयोजक सुमेरसिंह भाटी ने बताया कि वर्तमान समय में इस ओरण पर अतिक्रमण हो रहा है जिसमें राजगढ विन्‍ड रिन्‍यु पावर, सोलर में अडाणी ग्रुप, ईन्‍डेन व अन्य कई प्रकार की कम्पनियों द्वारा रेगिस्तानी पर्यावरण को नष्ट किया जा रहा है।

इस क्षेत्र में 5000 ऊंट व 30 हजार से भी अधिक भेड़ बकरियां हैं। धीरे धीरे चारागाह क्षेत्र खत्‍म होता जा रहा है। यह ओरण 60000 बिघा भू भाग में फैला हुआ है। जो धीरे धीरे कम्पनियों की भेंट चढ जाएगा। इसमें कई प्रकार की बिजली या सोलर लाईनें निकल रही हैं। जिससे कुरजां व साईबेरियन जैसे पक्षी मर जाएंगे है।

रेगिस्तान का अपना पारिस्थितिक तंत्र है  जिस पर नकारात्मक असर पड़ेगा। यहां से पवन चक्कियों से उत्पन्न बिजली के स्थानांतरण हेतु लाईनों को सरकार द्वारा अन्‍डरग्राउण्ड भी तो करवाया जा सकता है। एक तो यहां वनस्पति कम है और दूसरा उसका भी विनाश।

हमने देखा कि किस तरह से लोगों का रेगिस्तानी पर्यावरण के साथ गहरा लगाव है, यहां की जैव विविधता भी निराली है। रेगिस्तान में कई ऐसी वनस्पतियां हैं जिनका उपयोग औषधियों के रूप में किया जा सकता है। यहां के पशु अभाव एवं संघर्ष में जीने के काबिल है। हमारे सिर पर चढ रही औद्योगिक विस्तार की बला कहीं मरूस्थली जैव संतुलन को बिगाड़ ना दे।

( यह स्टोरी बी पॉजिटिव इंडिया के साथी अरविन्द सुथार ने की )

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युवाओं का समूह जो समाज में सकारात्मक खबरों को मंच प्रदान कर रहे हैं. भारत के गांव, क़स्बे एवं छोटे शहरों से लेकर मेट्रो सिटीज से बदलाव की कहानियां लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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