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कुलबीर बिष्ट: शादी के कार्ड छापने से लेकर पहाड़ों में डिजिटल इंडिया बसाने तक का प्रेरणादायी सफ़र

आपने पहाड़ियों के कई किस्से सुने होंगे। पहाड़ी इलाकों को बेस बनाकर कई हिंदी फिल्में भी बनीं हैं, जिन्होंने बहुत कामयाबी हासिल की है। क्या आपको पता है कि पहाड़ी लोग पहाड़ जैसे हौसले के साथ जीते हैं। कामयाबी के दरवाजे भी उन्हीं के लिए खुलते हैं, जो उन्हें अपने हौसलों के बल पर खोलने की ताकत रखते हैं। इन पंक्तियों को उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के गरूड गंगा-पाखी (पीपलकोटी) निवासी कुलबीर बिष्ट ने सार्थक करके दिखाया है।

बिष्ट का ‛आत्मनिर्भर माॅडल’ आज लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। यदि दृढ इच्छा शक्ति और संकल्प हो तो पहाड़ में रहकर भी बहुत कुछ किया जा सकता है। जरूरत केवल नजरिया बदलने और अपनी माटी पर भरोसा करने की है। इस बात को कुलबीर ने साबित कर दिया है।

बचपन से बिष्ट का सपना था कि वे कुछ अलग करें, इसलिए वे कभी नौकरी के पीछे नहीं भागे। उनके पास आर्मी, पुलिस सहित अन्य के विभागों में जाने के सुअवसर थे, लेकिन वे कभी इस चक्कर मे पड़े ही नहीं। कम्प्यूटर में डिप्लोमा और कॉमर्स से स्नातक की पढ़ाई करने पर उनके पास सीए बनकर सुनहरा भविष्य बनाने का भी मौका था, लेकिन उन्होंने सीए बनने की जगह पहाड़ में रहकर कार्य करने को प्राथमिकता दी।

शादी के कार्ड छापने के काम से शुरुआत की कुलदीप ने

कम्प्यूटर डिप्लोमा करते हुए उन्होंने वहां शादी के कार्ड बनाना सीखे। बाद में मन में ख्याल आया की क्यों न खुद का कार्य किया जाए। 2010 में उन्होंने पीपलकोटी जैसे पहाड़ के छोटे से कस्बे में (जहां से उनका गांव बमुश्किल 5 किमी दूरी पर था) में अपना कम्प्यूटर सेंटर और शादी के कार्ड बनाने के लिए एक छोटी सी किराये की दुकान ली।

शुरूआत के दो तीन साल थोड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, तरक्की की राह पर आगे बढ़ते ही चले गए। आज 10 साल बाद वे ‛आयुषी कम्प्यूटर एजुकेशन’ के सीईओ हैं तो वहीं ‛सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस’ और ‛सिद्धनाथ डिजिटल फोटोग्राफी’ के मालिक भी। उन्होंने कई युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी दिया है।

वे प्रतिमाह अपने पहाड़ में उतना कमा लेते हैं, जितना एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का मैनेजर घर से हजारों किलोमीटर दूर महानगरों में रहते हुए एक महीने में कमाता है।

कम्प्यूटर के ज़रिए पहाड़ को बना रहे है डिजीटल

वे सामाजिक गतिविधियों, पत्रकारिता और संस्कृति के भी संवाहक हैं। वे पीपलकोटी से ‛राष्ट्रीय सहारा’ के संवाददाता हैं। पीपलकोटी की हर छोटी बड़ी खबरों की सटीक और प्रमाणिकता का प्रमाण वे खुद हैं।

पीपलकोटी जैसे पहाड़ के छोटे कस्बे से वे कम्प्यूटर एजुकेशन और काॅमन सर्विस सेंटर के जरिए लगभग 50 से भी अधिक ग्राम सभाओं के लोगों के की-पर्सन बने हुए हैं। सेंटर के जरिए वे ग्रामीणों के बिजली, पानी, टेलीफोन बिल, मोबाइल, डिश रिचार्ज, एलआइसी की किस्तें, गाड़ियों के एश्योरेंस, रेलवे टिकट, हवाई टिकट, ड्राइविंग लाइसेंस के ऑनलाइन भुगतान के अलावा आय प्रमाण पत्र, मूल निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाणपत्र, आधार, पेन कार्ड सहित विभिन्न प्रमाण पत्रों को नियत समयावधि में बनाकर लोगों तक पहुंचाते हैं। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के फार्म भी इनके यहां ऑनलाइन रूप से भरे जाते हैं।

युवाओं को कम्प्यूटर का 6 महीने से लेकर एक वर्षीय प्रशिक्षण भी देते हैं। प्रिंटिंग प्रेस के जरिए शादियों के आकर्षक कार्ड की छपाई भी वे करते हैं, जिससे शादियों के सीजन में उन्हें अच्छा मुनाफा होता है। फोटोग्राफी की बुकिंग से भी रोज़गार करते हैं। कुल मिलाकर पहाड़ के एक छोटे से कस्बे में वे डिजिटल इंडिया की जीती जागती तस्वीर हैं।

फ़ोटोग्राफ़ी की बारीकियों के साथ ही पत्रकार भी है कुलदीप

बातचीत के दौरान वे बताते हैं,“अब समय आ गया है कि पहाड़ के प्रति लोगों का नजरिया बदलना चाहिए। यहां रहकर भी बहुत कुछ किया जा सकता है। बस थोड़ा धैर्य और हौंसला चाहिए। पहाड़ों में भी रोजगार के असीमित अवसर हैं।

पशुपालन, कृषि, बागवानी, मत्स्य, मुर्गी, जड़ी बूटी उत्पादन, डेरी उद्योग, रिंगाल व हस्तशिल्प, ट्रैकिंग, साहसिक पर्यटन, धार्मिक पर्यटन सहित विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार सृजित किया जा सकता है।

मेरा सपना था की कुछ अलग करना है। शुरू में थोड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन आज जब खुद को देखता हूं तो शुकुन मिलता है। सपना है कि पहाड़ में डिजिटल इंडिया को धरातल पर उतार सकूं।

देखा जाए तो इस माॅडल से सीख लेने की आवश्यकता है, ताकि पहाड़ में रहकर रोजगार के अवसरों का सृजन किया जा सके। साथ ही पहाड़ों से हो रहे पलायन को रोका जा सकता है।

बी पॉजिटिव इंडिया’, कुलदीप बिष्ट के आत्मनिर्भर माॅडल की सराहना करता है और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

संपादन: मोईनुद्दीन चिश्ती

संजय चौहान
संजय चौहान
संजय चौहान उत्तराखंड से हैं और पॉजिटिव जर्नलिज्म के लिए जाने जाते हैं.

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