Home कला एवं संस्कृति संगीत यानी ईश्वर की भाषा: पंडित विश्वमोहन भट्ट

संगीत यानी ईश्वर की भाषा: पंडित विश्वमोहन भट्ट

उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में एक जर्मन महिला पर्यटक से 25 रुपए में खरीदे हवाईन गिटार से अपनी संगीत साधना शुरू की। उनमें कुछ कर गुजरने का जज़्बा शुरू से था, इसी के चलते इस गिटार में अपनी मौलिक सोच से डेढ़ दर्जन से अधिक अतिरिक्त तार जोड़ते हुए इसे गिटार से सितार, सरोद एवं वीणा का अनोखा संगम बनाने में कामयाबी हासिल की।

भारतीय शास्त्रीय वाद्यों की दुनिया में आज इस यंत्र को ‘मोहन वीणा’ कहा जाता है और यह संगीतकार कोई और नहीं पद्मभूषण से सम्मानित पंडित विश्व मोहन भट्ट हैं।

बातचीत के दौरान पंडित भट्ट बताते हैं,“लगभग 350 साल पहले गुलाबी नगरी जयपुर की बसावट के दौरान महाराजा जयसिंहजी ने तेलंगाना से भट्ट वंश के कुछ संगीतज्ञों, कवियों, संस्कृत के पंडितों, नाटककारों सहित अनेक विधाओं के इंटेलेकचुअल्स को यहां लाकर बसाया, उन्हें हवेली और गांव दिए।

इसी परंपरा में आगे चलकर मेरे मां-बाबा चन्द्रकला-मनमोहन भट्ट हुए, जो गायक थे। इन्हीं के घर 27 जुलाई, 1950 को मेरा जन्म हुआ। मेरे परिवार में माता पिता के अलावा बड़े भाई शशिमोहनजी, महेंद्रजी, रविमोहनजी, बहन मंजू बेन मेहता और कृष्णमोहनजी भी संगीतज्ञ हुए। मुझे शुरुआती तालीम मां-बाऊजी और भाई साहब से मिली।

तालीम लेते वक़्त मैंने गायन सीखा और सितार भी बजाया! बड़े भाई साहब पंडित रविशंकरजी के शिष्य थे। एक दिन रविशंकरजी ने मुझे रियाज़ करते देख मां से कहा,“इसमें एक आग है, देख लेना, यह बहुत आगे जाएगा, अपना ही नहीं, आप सबका नाम रोशन करेगा !”

रविशंकरजी की इसी भविष्यवाणी को सच में बदलने की खातिर 1983 में मैंने उनसे गंडा बंधवाया और विधिवत शागिर्दी में रहकर तालीम हासिल की!”

जीवन में शास्त्रीय संगीत के मायने…

जिस तरह हम शरीर को फिट रखने के लिए भोजन करते हैं, उसी तरह आत्मा को भूख लगती है, आत्मा की पेट भराई का काम संगीत के जरिए होता है।

उनकी नज़र में संगीत ईश्वर की भाषा है। ईश्वर ने इसे मानव मात्र की सेवा के लिए दुनिया में उतारा है। दैवीय शक्ति यानी ईश्वर अपनी इसी भाषा के जरिए हमारी आत्मा को तृप्त करने का काम करते हैं।

70 को उम्र में भी रियाज़ करते हैं?

वे आज भी रियाज़ करते हैं! उनकी सोच है कि साज़ लेकर बैठ जाना ही रियाज़ है, जरुरी नहीं! रियाज़ तो मन में भी किया जा सकता है। सफ़र या फ्लाइट के दौरान भी मैं रियाज़ कर रहा होता हूं। इस दौरान मेरे मन मस्तिष्क में अनेकों कल्पनाएं उभरती हैं। अनेकों राग रागिनियां अपना असर दिखा रही होती हैं।

जानकर हैरानी होगी, एक शाम जब अंडमान निकोबार समुंदर के किनारे अकेले बैठा था, उस दौरान ऐसी ऐसी कल्पनाओं ने आकर घेरा कि पूछो मत! इन्हीं कल्पनाओं के संग रियाज़ किया और एक एलबम बना डाली।

जब शॉवर ले रहा होता हूं, तब भी ग़ज़ल की कम्पोजीशन कर रहा होता हूं। सारी बात मन की है। मेंटल रियाज़ के लिए आपका अपने संगीत के प्रति समर्पित भाव पहली शर्त है।

यूं मिला सर्वोच्च ग्रैमी सम्मान…

संगीत जगत के सर्वोच्च ‘ग्रैमी पुरस्कार’ से सम्मानित पहले भारतवंशी संगीतज्ञ पंडित रविशंकरजी का शिष्य होने का उन्हें फ़क्र है। वे अपने इस सम्मान को उन्हीं के आशीर्वाद का फल मानते हैं।

संगीतकार रॉय कूडर को उनके 2-3 एलबम पसंद आए थे। उन्होंने पंडित भट्ट से मिलने की इच्छा जताई और म्यूजिक कंपनी से सम्पर्क किया, कहा की पंडितजी के साथ बजाना चाहता हूं।

वे उन दिनों अमेरिका दौरे पर लॉस एंजेल्स में थे। उनके पास एक रात का समय था। इस रात इन दोनों संगीतकारों ने सेंटा बारबरा के एक चर्च में वन टेक रेकॉर्डिंग की।

‛ए मीटिंग बाय दी रिवर’ नामक इस एलबम में 4 कंपोजिशन्स थीं। यह जुगलबंदी इतनी सराही गई, इतनी लोकप्रिय हुई कि पूछो मत! उस एक रात को की गई इन दोनों की तपस्या का फल 1 मार्च, 1994 के दिन ग्रैमी पुरस्कार के रुप में मिला।

अब भी जुगलबंदियां करते हैं भट्ट?

वे हमेशा कहते हैं कि कलाकार को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए। विश्व के कई दिग्गजों और अनेकों बार ग्रैमी पुरस्कार विजेता रहे कलाकारों के संग भी उन्होंने जुगलबंदियां की हैं।

अमेरिका के बेंजो आर्टिस्ट हैं बेला फ्लैक। 2 बार के ग्रैमी विनर हैं, कंट्री म्यूजिक बजाते हैं। जेरी डगलस एक आर्टिस्ट हैं, डाबरो गिटार बजाते हैं। अरेबिक आर्टिस्ट सिमन साहिन हैं जो औद बजाते हैं। चाइना की लेडी म्यूजिशियन जेविंग चाईन हैं। इन सभी के साथ इन्होंने जुगलबंदियां की हैं। चायनीज-अमेरिकन-इंडियन जुगलबंदी के लिए 1997 में ग्रैमी नॉमिनेशन मिला।

इसके अलावा अपने बड़े बेटे सलिल के साथ भी उन्होंने कई अलबम की हैं। कर्नाटक संगीत के कई दिग्गजों के साथ काम किया। एमएस गोपालकृष्णनजी, नागगुड़ी जसमय्याजी, एल सुब्रमण्यमजी, मंजुनाथजी, एन रमणीजी, शशांकजी, रविकिरणजी, बाल मुरलीकृष्णजी आदि प्रमुख नाम हैं।

क्लासिकल म्यूजिक का फ्यूचर…

उनकी नज़र में भारतीय शास्त्रीय संगीत बहुत ही गहरी जड़ों वाला है, इसे किसी से भी, किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं। इसके सुनने समझने वाले भले ही कम हैं, पर नई पीढ़ी के कलाकारों से उन्हें बहुत उम्मीदें हैं, वे अपनी तरह से योगदान देकर इसे न सिर्फ समृद्धि प्रदान कर रहे हैं बल्कि अपने अपने घरानों को भी आगे ला रहे हैं।

अपने पुत्र और सात्विक वीणा वादक सलिल भट्ट, सिंगर रशीद खान, कौशिकी चक्रवर्ती, संजीव अभ्यंकर आदि कलाकारों से बहुत उम्मीदें हैं। उन्हें लगता है ये सब माहिर एक रोज़ इतिहास बनाएंगे।”

घूमने का शौक है…

पंडित विश्व मोहन को प्रकृति के संग रहना सुहाता है, उन्हें नेचर से प्यार है। हरियाली, हवा, पहाड़, पानी उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं। उन्हें चिड़ियों से प्यार है, वे उनकी आवाज़ों से प्रभावित होते हैं। घूमने का शौक है, अब तक 81 से अधिक देश घूम चुके हैं। क्रिकेट के शौकीन हैं, पर फाइनल मैच देख पाते हैं। ओलंपिक गेम्स देखते हैं।

राजनीति के सारे अपडेट रखते हैं। मोदी साहब क्या करते हैं? क्या कहते हैं, इसकी जानकारी से भरे रहते हैं। माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के पास मेरा एलबम है। जब वे योग करते हैं तो इसे सुनते हैं। यह बात खुद उन्होंने पंडित जी को बताई।

प्रस्तुति: मोईनुद्दीन चिश्ती (देश के वरिष्ठ लेखक- पत्रकार हैं और अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए ख़ासे लोकप्रिय हैं)

Avatar
MOINUDDIN RBS CHISHTY
लेखक स्वतंत्र कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं। वे अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए देशभर में लोकप्रिय हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read

आयुर्वेदनामा: अत्यंत गर्म और तीखे स्वभाव की वनस्पति ‛चित्रक’

आज आयुर्वेदनामा में हम चित्रक के बारे में जानकारी हासिल करेंगे जो मुख्य रूप से पहाड़ी स्थानों व जगलों में पाया जाने...

कैरियर लैब: जनसहयोग से ले रही है आकार, ग्रामीण परिवेश के बच्चें भरेंगे उड़ान !

आपने लैब के बारे में तो अवश्य ही सुना होगा। अस्पतालों में भी जांच करने के लिए लैब या लैबोरेटरी होती हैं।...

ऋचा और फ़ाएज़: कॉफ़ी ही नहीं पिलाते, युवाओं को मंच भी प्रदान करते हैं

यह कहानी है जोधपुर में रहने वाली महिला उद्यमी ऋचा शर्मा की, जिन्हें बचपन से किताबों से लगाव था। बातचीत के दौरान...

प्रधानाध्यापिका की पहल ने बदली स्कूल की तस्वीर, गांव के सहयोग से करवा डाले 10 लाख के विकास कार्य

जहाँ चाह है, वहां राह है . . . यह पंक्तियाँ एक सरकारी स्कूल की प्रधानाध्यापिका पर सटीक बैठती...

आयुर्वेदनामा: कड़वाहट का राजा यानी ‛कालमेघ’

आज आयुर्वेदनामा में हम कालमेघ के बारे में जानकारी हासिल करेंगे जो एक बहुवर्षीय शाक जातीय औषधीय पौधा है।