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सरकारी स्कूल : सेनेटरी पैड के साथ ही मिलती हैं ब्यूटीशियन की ट्रेनिंग, मुफ्त में पढाई के साथ स्किल भी !

देश में सरकारी स्कूल का नाम आते ही जर्जर भवन, सुविधाओं से वंचित क्लास रूम और स्कूल में मंडराते आवारा जानवर लेकिन एक सरकारी शिक्षिका को यह मंजूर नहीं था. स्कूल के हालात सुधारने के साथ ही लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना शुरू किया. एक समय पढ़ने के लिए स्कूल में लड़कियां नहीं होती थी लेकिन आज स्कूल में सब प्रेजेंट रहती है. ऐसा ही कुछ नजारा होता है बिहार के सरकारी स्कूल का. छोटे-छोटे बदलावों से लड़कियों का जीवन बदलने वाली शिक्षिका का नाम है रिंकू सिंह (Rinku Singh).

रिंकू सिंह अभी बिहार के रोहतास जिले के मिडिल क्लास स्कूल दरिहट में तैनात है. यह स्कूल डेहरी-ऑन-सोन शहर से 8 किमी दूर है. इस सरकारी स्कूल में करीब 800 बच्चे पढ़ते हैं, जिनमें करीब 300 से ज़्यादा लड़कियां पढ़ती हैं. यहाँ लड़कियां सिर्फ़ हाज़िरी बनाने के लिए ही स्कूल आती थी. हाज़िरी बन जाने के बाद वो उसी दिन नज़र आती थी जब स्कूल में कुछ मिलने वाला हो.

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इस समस्या से वो परेशान थी और उन्होंने अपने पति अजय सिंह से सलाह मांगी. उन्होंने कहा कि इन लड़कियों से 5 रुपये फाइन ले लो और इनके पैसे से ही सेनेटरी पैड खरीद कर स्कूल में रख दो. यह आईडिया इनको पसंद आया और उन्होंने स्कूल में इसे लागू करने का फैसला किया.

Rinku Singh with Students
छात्रों के साथ रिंकू सिंह | चित्र साभार : बिक्रम सिंह

रिंकू सिंह लड़कियों से मासिक धर्म के बारे में खुलकर बात करने लगी. उनके व्यवहार से क्लास की छात्राएं काफी प्रभावित हुईं. क्लास में 90 प्रतिशत से ज़्यादा उपस्थिति होने लगी. इसके साथ ही पैसे जोड़कर उन्होंने सेनेटरी पैड ख़रीदे साथ ही साथ मेक-अप का समान भी खरीदा. रिंकू सिंह प्रतिभावान है और ब्यूटिशियन का काम भी जानती है. लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पैड बांटने के साथ-साथ छात्राओं को मेकअप करना भी सिखाती है.

रिंकू सिंह बताती है कि बचपन से ही इन्हें पढ़ाने का शौक था. इसलिए इन्होंने शिक्षिका बनना ही अपना लक्ष्य रखा. उन्हें बच्चों से बहुत ही लगाव रहा है जिसके चलते वो घर में छोटे भाइयों एवं बहनों को भी पढ़ाती थी. अपनी पढ़ाई के बाद उनका चयन सरकारी स्कूल में शिक्षिका के रूप में हुआ.

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बिहार में एक समस्या ये भी है कि लड़कियों की बहुत ही कम उम्र में शादियां हो जाती हैं. रिंकू सिंह को बहुत बुरा लगता है, वो चाहती हैं कि लड़कियां आगे पढ़े और अपनी पहचान बनाए. उन्होंने बाल-विवाह को रोकने के लिए अभिभावकों से बात की और पांच से ज्यादा लड़कियों को बाल-विवाह के चंगुल से बचाया. अब यह छात्राए पढ़ लिख कर अपनी ज़िंदगी बदलना चाहती हैं.

उनके सामाजिक कार्यों एवं शिक्षण संस्थान में बदलाव के कार्यों में परिवार का पूरा सपोर्ट रहता हैं. वो अपना कीमती समय निकालकर बच्चियों को सशक्त कर रही हैं. अपने घर का काम करने के बाद, स्कूल में पढ़ाना और बचे हुए समय स्कूल की छात्राओं को देना बहुत बड़ी बात है. अगर इनके आइडिया अगर हर स्कूल में लागू कर दिया जाए या करवा दिया जाए तो बहुत सारी बेसिक समस्याएं स्वत: ही ख़त्म हो जाएगी.

बी पॉजिटिव इंडिया, रिंकू सिंह के कार्यों की सराहना करता हैं और उम्मीद करता हैं कि आप से प्रेरणा लेकर गांव एवं देहात की लड़कियां अपने जीवन में सकारात्मक कार्य करेगी.

( ये स्टोरी बी पॉजिटिव इंडिया के साथी बिक्रम सिंह ने की )

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News Deskhttps://www.bepositiveindia.in
युवाओं का समूह जो समाज में सकारात्मक खबरों को मंच प्रदान कर रहे हैं. भारत के गांव, क़स्बे एवं छोटे शहरों से लेकर मेट्रो सिटीज से बदलाव की कहानियां लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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