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संजीव कुमार: बिहार के इस युवा ने बनाया पुस्तकालय, नाम दिया ‛संस्कार शाला’

बिहार के नालंदा जिले के अस्थावा प्रखण्ड में रहने वाले संजीव कुमार ने मार्केटिंग में एमबीए किया और 20 साल से कंप्यूटर का होलसेल-रिटेल बिजनेस करते हुए बहुतों को रोजगार से जोड़ा है।

समाज में हो रहे नैतिक पतन को लेकर वे बड़े उदास रहते हैं। वे कहते हैं,“लोग स्वार्थ में इतने अंधे हो चुके हैं कि पैसों के लालच में अपने बूढ़े माता-पिता को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए घर से निकाल देते हैं। अधिकतर घरों में भाई-भाई में प्रॉपर्टी की लड़ाई, सास-बहू में इगो की लड़ाई हो रही है। इस कारण परिवारों में खुशियां खत्म हो रही हैं।

संस्कारशाला मे पढ़ाई करते हुए बच्चें

ऐसे में मुझे संस्कारों पर फिर से कार्य करने की जरूरत महसूस हुई। इसी बात मद्देनजर रखते हुए मैंने ‛संस्कार शाला’ नामक पुस्तकालय की स्थापना की जहां, न सिर्फ असहाय, बेबस, लाचार, जरूरतमंद बच्चों को पढ़ने का उचित मंच और माहौल मिले, बल्कि समय-समय पर कई साहित्यिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हुए उनमें नैतिक शिक्षा के जरिए सामाजिक पतन को भी रोका जा सके।”

उनके मन में संस्कार शाला खोलने सपना बचपन से था। विद्यार्थी जीवन में ही वे लाइब्रेरी से जुड़ गए थे। दुनिया की हर चीज अपग्रेड होकर अत्याधुनिक सुख सुविधाओं से लैस हुई, लेकिन पुस्तकालयों की हालात दिन-ब-दिन बदतर ही हुई।पाठक कम होते चले गए। नैतिक शिक्षा का कोई मंच नहीं था। चारों ओर नकारात्मक माहौल बन गया था।

ऐसे में उन्होंने अत्याधुनिक संस्कार शाला सह पुस्तकालय खोलने की योजना बनाई। उन्हें इस बात की खुशी है कि 4 महीनों में उन्हें लोगों का सकारात्मक सहयोग मिला। पाठकों ने संस्कार शाला में आकर पढ़ने में रुचि दिखाई।पूरे भारत से 6000 से अधिक किताबें भी इन्हें मिलीं।

संस्कार शाला खोलने के विचार को लेकर संजीव कई लोगों के पास मदद के लिए गए। बहुत सारे लोगों ने उनका मजाक उड़ाया लेकिन कुछ सकारात्मक लोगों ने निस्वार्थ भाव से कुर्सियां,टेबल, माइक, पोडियम और आर्थिक सहायता भी की। सफलता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उद्घाटन में लगभग हज़ार लोग आए। सबसे बड़ी बात बिना किसी सरकारी सहायता के हजारों लोगों के सहयोग से संस्कारशाला सह पुस्तकालय खुला और सफलता के पथ पर अग्रसर है।

लगभग चार महीनों में 500 से अधिक बच्चे संस्कार शाला में आए हैं, जिन्हें आत्मबल से जोड़ने का मौका संजीव को मिल चुका है। इन बच्चों को लगता है कि वे अपने देश, समाज, राज्य की प्रगति की बेहतरी के लिए कुछ कर सकते हैं। बच्चों ने सिगरेट, गुटका या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन न करने की प्रतिज्ञा ली।

संस्कारशाला सह पुस्तकालय का उद्देश्य अगले कुछ सालों में कम से कम दस हजार बच्चों को ईमानदार और अच्छा इंसान तो बनाना ही है, साथ ही साथ वो अपनी नौकरी या अपने काम में जहां भी रहें, दबे, कुचले, बेबस एवं असहाय गरीब बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेवारी भी ले।

अंत में संजीव कुमार संस्कार शाला से जुड़े संस्मरण साझा करते हुए कहते हैं,“एक छात्र ने अपने एक शाम के नाश्ते का पैसा यह बोल कर मुझे दिया कि मैं इसे समाज की भलाई के लिए लगाऊं।

गोलगप्पे बेचने वाले बच्चे ने अपने दिनभर की सारी कमाई लाकर मेरे हाथ में रख दी। कहा मैं तो पढ़ नहीं पाया, आने वाली पीढ़ी में गरीबी के कारण कोई पढ़ नहीं पाए, ऐसा नहीं होना चाहिए।

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बी पॉजिटिव इंडिया’, संजीव कुमार के प्रयासों की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

संपादन: मोईनुद्दीन चिश्ती

Ajay Kumar Patel
Ajay Kumar Patel
बी पॉजिटिव इंडिया के झारखण्ड प्रभारी हैं. इसके साथ ही झारखण्ड के आदिवासी बच्चों की पढाई के लिए 'टीच फॉर विलेज (Teach For Village) ' नाम से संस्था चलाते हैं. इसके साथ ही सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं.

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