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नारी शक्ति : संघर्ष और हौसले से खुद को निखारा, आज कहलाती हैं ‛सीता मां’

अपनेपन का जादू जगाने वाली यह कहानी है जोधपुर के प्रताप नगर में रहने वाली श्रीमती सीता बिजानी की। जन्म सन 1965 में सिंध के मिट्ठी भट्टियान गांव में हुआ।

जब 7 महीने की थीं, तब पिता का साया सिर उठ गया। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जीवन में संघर्ष ने कितनी जल्दी दस्तक दी!

1971 के युद्ध के बाद सिंध से पलायन करते हुए सीमावर्ती बाड़मेर के धनाऊ गांव में आकर रहने लगीं। अपने बड़े भाई की पढ़ाई में सहयोग करने के लिए दिन-रात लगकर काशीदेकारी का काम किया।

अपने परिवार के साथ सीता बिजानी

साल 1978 में मिट्टी चारणान गांव से आए बिढानी निवासी गणेश बिजानी से विवाह करते हुए जीवन की एक नई शुरुआत की। वर्ष 1984 में सूर्यनगरी जोधपुर के प्रताप नगर क्षेत्र में पति के साथ खुद का आशियाना बनाकर रहने लगीं और अपनी सेवा भावना को दिन-ब-दिन बढ़ाती गईं।

बात उस समय की है जब,  आसपास के घरों को छोड़कर केवल उन्हीं के घर में पानी का कनेक्शन हुआ करता था। हुडको क्वार्टर में रहने वाली महिलाएं पानी यहीं से भरती थीं, वह भी उनकी मौजूदगी में ताकि उन्हें अपनापन महसूस हो। झाड़ू लगाने वाली 20-30 हरिजन महिलाओं के अलावा स्कूल से घर जाने वाले बच्चों को ठंडा पानी पिलाना भी उनकी आदतों में शुमार रहा है।

बातचीत के दौरान वे बताती हैं,“जोधपुर आते समय मेरी सासु मां ने मुझे एक बात गांठ बंधवाई थी कि अपने घर आने वाले किसी भी इंसान को बिना खिलाए-पिलाए कभी मत जाने देना।” इसी भावना की चलते इनके पति गणेश जी ने गत वर्ष घर के सामने ही एक प्याऊ और आने जाने वाले राहगीरों के सुस्ताने के लिए टीन शेड का निर्माण भी करवाया।

अपनी बेटी के साथ सीता बिजानी

90 के दशक की शुरुआत में उनके घर के सामने ही  साइकिल से गिरने पर एक बच्चे को चोट लग गई। उस वक़्त उनके घर में तत्काल मरहम पट्टी के लिए डेटॉल और रुई ही थी। उस दिन से उन्होंने घर में मेडिकल किट रखना शुरु कर दिया और ऐसे छोटे हादसों में राहत देने के लिए फर्स्टएड देना भी सीखा। तब से अब तक सीता उस क्षेत्र में होने वाले किसी भी हादसे या छोटे मोटे एक्सीडेंट में संकटमोचक की भूमिका में उभरी हैं। पूछे जाने पर बताती हैं कि उन्हें अब याद भी नहीं कि कितनों के बहते रक्त पर पट्टी बांधी होगी! 

बच्चों पर ममता लुटाने वाली इस ममतामयी सीता मां के घर के आसपास के 15-20 बच्चे उनके घर में खेल कूद कर कब जवान हो गए, खुद बच्चों को नहीं पता। वे बताती हैं कि इस दौरान यदि खाने का समय हुआ तो सभी को अपने हाथों से भोजन करवाया। आज हाल यह हैं कि उन्हें न सिर्फ उनके बच्चे बल्कि क्षेत्र के सभी बच्चे और दुकानदार तक ‛मां’ कहकर ही संबोधित करते हैं।

किन्हीं कारणों के चलते अपने भाई की पढ़ाई पूरी ना करवाने की टीस उनके मन में सदैव रही जिसे अपने बच्चों को पढ़ाकर पूरा किया।

अपनी बड़ी बेटी को होमवर्क करवाते समय उन्होंने पढ़ना-लिखना सीखा। बेटी ने पाक विस्थापित सुथार समाज की पहली ऐसी लड़की बनने का गौरव हासिल किया जिसने दसवीं पास की। बाद में आगे की पढ़ाई पूरी कर राज्य सेवा में चयनित हुई।

अपनी बहुओं के साथ सीता बिजानी

56 वर्षीय सीता अपने पति गणेश जी को ही अपना रियल लाइफ गुरु मानती हैं। भारतीय पत्नी की तरह उन्होंने पति को कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग दिया। चाहे उनकी समाजसेवा हो, राजनीतिक सक्रियता हो या घर के सामने खाली जमीन पर लगे पौधों की देखभाल। अपने भरे-पूरे परिवार पर इस मां को आज गर्व है।

दो बेटे 12वीं बोर्ड में जिले की मेरिट में आए, अब पढ़ाई के बाद बिजनेस कर रहे हैं। छोटी बहू ने शादी के बाद एमए-बीएड किया जिसमें उनकी उल्लेखनीय भूमिका रही।

कहने को यह आम और साधारण सी कहानी है और हम में से बहुतों ने जीवन में ऐसे कई किरदार देखे होंगे पर हमारी कोशिश है कि हम ऐसे सच्चे किरदारों को आपसे रूबरू करवा सकें। 

बी पॉजिटिव इंडिया’ सीता मां के कार्यों की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

प्रस्तुति: मोईनुद्दीन चिश्ती (देश के वरिष्ठ लेखक- पत्रकार हैं और अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए ख़ासे लोकप्रिय हैं)   

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MOINUDDIN RBS CHISHTY
लेखक स्वतंत्र कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं। वे अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए देशभर में लोकप्रिय हैं।

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