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17 सालों से ‛पीरियड’ और ‛पैड’ पर जागरूक कर रही है यह महिला, कार्यों पर बनीं फ़िल्म ने जीता ‛ऑस्कर’

कभी कभी संघर्ष की कहानियां इतनी आगे निकल जाती हैं कि संघर्ष से जूझने वाला इंसान भी एक कीर्तिमान बनकर रह जाता है। ऐसा ही कुछ सुमन के साथ भी हुआ, जिन्हें आज ‛पैड वुमन’ के नाम से लोकप्रियता हासिल है।

अपनी कहानी साझा करते हुए वे बताती हैं,“मैं सुमन! जन्म दिल्ली में हुआ। साल 2000 में, जब मैं 10वीं में थी, तो मेरी शादी हापुड़ से 10 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव में कर दी गई।

ग्रामीण जीवन शहरी जीवन से विपरीत था। महिलाओं की जरूरतों के बारे में शायद कोई भी नहीं सोचता था। न तो घर में बाथरूम था और ना रसोईघर। महिलाएं या तो सुबह जल्दी उठकर या रात में खेत में निपटने जाया करती थीं। उनके नहाने के लिए भी घर में ही व्यवस्था थी। पीरियड्स के दौरान तो बहुत मुश्किल होती थी। चेंज तक नहीं कर पाती थी। इवन पैड के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी। घर में जो कपड़े होते थे, उनको ही इस्तेमाल करना पड़ता था जिससे, इंफेक्शन का खतरा मंडराता रहता था।

अवार्ड समारोह के दौरान सुमन

अधिकतर महिलाओं को इंफेक्शन के कारण बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। महिलाओं को अपने ही स्वास्थ्य के बारे में जानकारी नहीं थी। पीरियड्स पर तो कोई बात भी नहीं करना चाहता था। गांव में पीरियड्स के दौरान महिलाओं को अलग रखा जाता था। उस दौरान अचार को हाथ नहीं लगाना, सिरका नहीं छूना, मंदिर नहीं जाना, सिर नहीं धोना, रोज नहीं नहाना और किसी से भी इस बारे में कोई बात नहीं करने के निर्देश रहते थे। अधिकतर लड़कियां तो इस बीच स्कूल तक नहीं जाती थीं।

मैंने अपने संघर्ष की शुरुआत आज से 17 साल पहले एक छोटे से स्कूल से की थी। जहां मैंने लड़कियों को पीरियड्स से जुड़ी जानकारियां देना शुरू किया। धीरे-धीरे महिलाओं से भी बात होने लगी।

मैंने एक गैर सरकारी संगठन में काम करते हुए अलग-अलगगायनोकोलोगिस्ट से स्वास्थ्य संबंधित ट्रेनिंग ली। जब मैं महिला सशक्तिकरण को लेकर काम कर रही थी, तब लोगों ने मुझे बहुत भला बुरा कहा। उनके हिसाब से हम घरों को बिगाड़ने वाली महिलाएं हैं। लोग मुझे देखकर मुंह बनाते फिर घर से भगा देते।

साल 2018 में एक फ़िल्म आई “Period. End Of Sentence” (सजा की अवधि समाप्त) जो कि 25 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री/शार्ट मूवी थी। यह फ़िल्म मेरे कार्यों पर आधारित थी। फिल्म का मुख्य किरदार मैंने निभाया। फिल्म ने साल 2019 का ऑस्कर अवार्ड जीता।

आज ज़िंदगी बदल गई है। मैं मोटीवेशनल स्पीकर के रूप में काम कर रही हूं। National Child and Woman Development Council की चेयरपर्सन हूं, लोग पैड वुमन के नाम से जानते हैं।

मेरे दो बच्चे हैं और बचपन से ही मेरे साथ वर्कशॉप में रहे हैं। मेरे काम और संघर्ष का असर उन पर भी हुआ है। आज महिलाओं के किसी मुद्दे पर बात होती है तो वे भी आवाज उठाते हैं, खासकर बेटी! वो भी मेरे साथ काम कर रही है। अपनी स्कूल और गांव की लड़कियों को बायोडीग्रेडबल पैड्स को लेकर जानकारी देती है।

साल 2017 में गांव में एक पैड यूनिट लगाया गया जो कि मेरे ही घर में था। वैसे तो यह ग्रामीण महिलाओं के लिए गांव में पहला रोजगार था पर गांववालों को इससे सबसे ज्यादा परेशानी हो रही थी। उनकी नजर में यह सबसे गंदा और खराब काम था।

हमें काम करने के लिए 6 महिलाओं की जरूरत थी, वे भी नहीं मिल पा रही थी। बहुत कोशिशों के बाद कुछ महिलाएं आने लगी हैं, लेकिन किसी न किसी वज़ह से वे रोज़ बदल जाती थीं, जिससे बहुत परेशानी होती थी। धीरे-धीरे काम आगे बढ़ा।
जब फिल्म बन रही थी, तब भी लोगों ने बहुत गालियां दी। यहां तक कि मारा भी। पर मैं लगी रही, क्योंकि मुझे इस काम को आगे ले जाना था।

आज परिस्थितियां बदल गई हैं। मैं अपने पति की भी आभारी हूं, जिन्होंने इस लड़ाई में मेरा साथ दिया। महिलाओं के लिए यही संदेश है कि वे घबराएं नहीं, जुटी रहें, कामयाबी तो काम से जुड़े रहने पर स्वतः ही मिलती जाती है।”

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Be Positive India, सुमन के संघर्षों को सलाम करता है और उम्मीद करता है कि आपसे प्रेरणा लेकर देश की लड़कियां ज़रूर आगे बढ़ेगी।

संपादन: मोईनुद्दीन चिश्ती

Ajay Kumar Patel
Ajay Kumar Patel
बी पॉजिटिव इंडिया के झारखण्ड प्रभारी हैं. इसके साथ ही झारखण्ड के आदिवासी बच्चों की पढाई के लिए 'टीच फॉर विलेज (Teach For Village) ' नाम से संस्था चलाते हैं. इसके साथ ही सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं.

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