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उत्तराखंड: इस युवा ने अपनी कल्पना शक्ति से गांव की दीवारों पर उकेरे खुशियों के रंग

हमारे जीवन में रंगों का क्या महत्व है? हमसे छुपा नहीं है। रंगों के बिना हम अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। रंगों बिन हमारा जीवन वैसा ही है, जैसे प्राण बिन शरीर। रंग उल्लास, खुशी, समृद्धि और कामयाबी का प्रतीक माने जाते हैं। हर कोई खुशियों के रंगों में डूबे रहना चाहता है। जीवन में रस घोलते यह रंग बेशकीमती हैं। हमारा फ़र्ज़ बनता है कि इन्हें जितना हो सके उतना बांटते हुए आगे बढ़ें ताकि, दूसरों के जीवन में भी खुशियों के रंग भरे जा सकें।

खुशियों के इन रंगों को औरों के जीवन में भरने का ऐसा ही एक प्रयोग युवा सुमित राणा (Sumeet Rana) ने कर दिखाया है जो उत्तराखंड, रूद्रप्रयाग जनपद के जखोली ब्लाॅक के अरखुंड गांव में रहते हैं।

इन दिनों अरखुंड गांव के लोगों के बीच उनके द्वारा बनाई वॉल पेंटिंग्स (Wall Painting) चर्चाओं का केन्द्र बनी हुई हैं। लाॅकडाउन में जहां चारों ओर निराशा फैली हुई है, वहीं सुमित ने अपनी इच्छाशक्ति, कल्पनाशीलता के बल पर रंग और कूंची से गांव की दीवारों को जगमग कर दिया है।

गांव की यही दीवारें आपस में एक दूसरे से गुफ्तगु करते हुए खिलखिलाने लगी हैं। सुमित की इस सराहनीय पहल पर गांववासी भी उनका हौसला बढ़ा रहें हैं। साथ ही अरखुंड नवयुवक संघ के प्रतिभाशाली युवा इन दिनों लाॅकडाउन की वजह से गांव में होने की वजह से उनके साथी बने हुए हैं।

लाॅकडाउन के दौरान सोशल डिस्टेनसिंग का पालन करते हुए अरखुंड गांव के यह युवा दीवारों को वाल पेंटिंग के जरिए ऐसी बना रहे हैं कि देखते ही नज़र लग जाए!

सुमित राणा रूद्रप्रयाग जनपद के अरखुंड गांव के बाशिंदे हैं। अरखुंड गांव 26/11 मुंबई हमले में शहीद हुए कमांडो गजेन्द्रसिंह बिष्ट का गांव है। लोकसंस्कृति की थाती 150 परिवार वाले इस गांव के ठीक सामने चौखंभा पर्वत का नयनाभिराम दृश्य देखने को मिलता है, जो सदैव प्रेरणा और हौसला देता है। दूसरी ओर सदानीरा मंदाकिनी नदी का शोर सदैव सृजनात्मक सोच को प्रेरित करता रहता है।

केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर से कला (ड्राइंग) में स्नाकोत्तर सुमित वर्तमान में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। विष्य में शिक्षक बनकर अपनी कल्पनाओं को रंग और कूची से नया मुकाम देना चाहते हैं। 2015 में उन्होंने अपने पांच सहपाठियों प्रमोद रावत (चमोली), त्रिलोक रावत (अल्मोड़ा), सूर्यकांत गोस्वामी (रूद्रप्रयाग), नीरज भट्ट (रूद्रप्रयाग), आलोक नेगी (पौडी) के साथ मिलकर Alive Art Group बनाया, ताकि रंग और कूची की ये जुगलबंदी नए आयामों को जन्म दे सकें।

आज इस ग्रुप में 5000 से अधिक पेंटिंग अपलोड की जा चुकी हैं। ग्रुप द्वारा अभी तक देहरादून, श्रीनगर, अगस्त्यमुनि, रूद्रप्रयाग सहित विभिन्न स्थानों पर पेंटिंग की प्रदर्शनियां लगाई जा चुकी हैं।

इन आयोजनों के बाद लोगों को मालूम हुआ की ड्राइंग (कला) का मतलब केवल आम, अमरूद बनाने तक सीमित नहीं, बल्कि पेंटिंग में असीमित संभावनाएं हैं। यह कला अभिव्यक्ति का एक बहुत बड़ा माध्यम है। विगत दिनों चेज हिमालय द्वारा आयोजित ऑनलाइन पेंटिंग प्रतियोगिता में भी सुमित राणा नें दूसरा स्थान प्राप्त किया।

चार साल पहले श्रीनगर में पढ़ाई के दौरान सुमित के मन में विचार आया कि उन्हें कुछ अलग करना है। उन्होंने अपने गांव में वाॅल पेंटिंग करने का निर्णय लिया, लेकिन समय न मिल पाने से सुमित का यह सपना अधूरा रह गया। कोरोना वायरस के वैश्विक संकट की इस आपातकालीन घड़ी लाॅकडाउन में सुमित के सपनों को मानों पंख लग गए।

लाॅकडाउन से पहले ही गांव के युवा देहरादून, श्रीनगर, रूद्रप्रयाग से अपने घरों को आ गए थे और इस दौरान उन्हें गांव में ही रहना था। इसी दौरान सुमित नें गांव में वाॅल पेंटिंग को लेकर ग्रामीणों के समक्ष अपनी बात रखी।

नवयुवक संघ के सहयोग से गांव में वाॅल पेंटिंग के लिए एक बाॅक्स बनाकर रंग और कूंचियां खरीदने के लिए पैसे जुटाए गए जिससे गांव के मुख्य रास्ते के दोनों ओर की दीवारों को वाॅल पेंटिंग से सजाया जा रहा है। अभी आधे गांव में वाॅल पेंटिंग का कार्य हुआ है। जल्द ही पूरे गांव के सभी बसावटों में ये कार्य किया जायेगा।

चित्रकार राणा बातचीत के दौरान बताते हैं,“सीमित संसाधनों के बाबजूद भी लाॅकडाउन में कुछ नया करने की सोची। आज खुशी होती है कि गांव की दीवारें पेंटिंग से जगमगा रही हैं। यह कार्य सभी युवाओं और सहयोगियों की प्रेरणा से हो पाया है। अभी तो शुरूआत है, लंबा सफर तय करना बाकी है।

मेरी कोशिश है कि वाॅल पेंटिंग के जरिये पहाड़ी लोकसंस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता और वन्यजीव को दर्शाया जाए, ताकि लोगों को इनके बारे में जानकारी मिले और इनके संरक्षण और संवर्धन हेतु वे आगे आएं। सूर्य की लालिमा हो या खेतों की हरियाली, आसमान का नीलापन या मेघों का कालापन, बारिश के बाद बिखरती इन्द्रधनुष की अनोखी छटा, बर्फ़ की सफ़ेदी और ना जाने कितने ही ख़ूबसूरत नज़ारे हैं जो हमारी आत्मा को प्रफुल्लित करते हैं। इस आनंद का राज रंगों की अनुभूति है। मानव जीवन रंगों के बिना उदास और सूना है, इसलिए जीवन में रंगों का होना और रंगों में जीवन का होना बेहद जरूरी है।

विश्व के पहले वाल पेंटिंग गांव, टिहरी का सौड गांव और बागेश्वर के खाती गांव को वाल पेंटिंग के जरिए विश्व में पहचान दिलाने वाले उत्तराखंड के युवा प्रोजेक्ट फ्यूल के दीपक रमोला की अभिनव को गूगल ने अपने ऑनलाइन म्यूजियम में इन गांवों की पेंटिंग को जगह दी। इसके बाद उत्तराखंड में वाल पेंटिंग को लेकर लोग आकर्षित हुए हैं।

गोपेश्वर, केदारनाथ, बद्रीनाथ, ऊखीमठ से लेकर देहरादून की विभिन्न जगहों पर वाल पेंटिंग बनाई गई हैं। रूद्रप्रयाग जनपद के ऊखीमठ, कैलाश बांगर में शिक्षक दीपक नेगी व संदीप कुमार द्वारा भी निजी प्रयासों से ऊखीमठ और स्कूलों में वाल पेंटिंग बनाई गई।

वहीं जिलाधिकारी चमोली स्वाति भदौरिया द्वारा चमोली के विभिन्न विद्यालयों में वाल पेंटिंग की अभिनव पहल की गई। वाल पेंटिंग के जरिए छात्र-छात्राओं को महत्वपूर्ण जानकारियां भी दी गईं।

ग्राफ़िक ऐरा विश्वविद्यालय, देहरादून के छात्र छात्राओं द्वारा रंग और कूची से चमोली के वाण गांव की दीवारों को खिलखिलाने का अवसर दिया।

वास्तव में देखा जाए तो रंग हमें एक रूप देते हैं, हमारे देखने को एक स्वरूप देते हैं। बिना रंगों के कोई त्यौहार, कोई उल्लास नहीं। बिना रंगों के कोई जीवन नहीं। एक बार सोच के देखिये कि बिना रंगों के जीवन कैसा होगा? युवा सुमित ने लाॅक डाउन का सदुपयोग करते हुए अपने गांव की वीरान दीवारों को रंग और कूंची से जगमग करने का जो बीड़ा उठाया, वो न केवल अनुकरणीय है, अपितु प्रेरणादायक भी है।

बी पॉजिटिव इंडिया’ की ओर से सुमित राणा को सुनहरे भविष्य की ढेरों शुभकामनाएं। आशा उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में यह रंग आपके जीवन में और भी खुशियां बिखेरें!

संपादन: मोईनुद्दीन चिश्ती

संजय चौहान
संजय चौहान
संजय चौहान उत्तराखंड से हैं और पॉजिटिव जर्नलिज्म के लिए जाने जाते हैं.

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