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सुरेंद्र शर्मा: यह युवा अपने प्रयासों से गांव में बना रहा है लाइब्रेरी

विद्वानों ने पुस्तकों के बारे में कितना कुछ कहा है, कितना कुछ लिखा है। किताबों में लिखी बातों को छुपा हुआ खजाना बताया गया, जिसे कोई लुटेरा लूट नहीं सकता। पुस्तक को बग़ीचा कहा गया, जिसे जेब में रखा जा सकता है। पुस्तक प्रेमी सबसे धनवान व सुखी बताया गया।

पुस्तकों की इसी महिमा पर मोहित होकर राजस्थान क़े नागौर जिले के सुरेंद्र शर्मा ने अपने स्तर पर गांव में पुस्तकालय बनाने की शुरुआत की है। वे पिछले कुछ सालों से इस लाइब्रेरी के लिए पुस्तक रुपी धन जुटाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।

बातचीत के दौरान सुरेंद्र बताते हैं,“किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त हैं। किताब का हर पन्ना जीवन के अनुभव देकर जाता है, लेकिन इंटरनेट और वीडियो इस के दौर में यह आखिरी सदी होगी जिसमें पन्ने पलटे जा रहे हैं। अगर गांवों में अच्छी किताबें उपलब्ध हों तो ग्रामीण भी इस दुनिया से जुड़ सकते हैं।

अपने साथियों की मदद से किताबें इकट्ठा कर रहे है सुरेंद्र

जहां पढ़ाई की किताबों के लिए संघर्ष करना पड़ता हो वहां उपन्यास, काव्य संग्रह, महापुरुषों की आत्मकथा और ग्रंथों की उपलब्धता के बारे में बात करना बेमानी हो जाता है। बावजूद इसके मैं अपने स्तर पर ग्रामीण इलाके में निःशुल्क पुस्तकालय के लिए प्रयास कर रहा हूं, जिसमें देश के अलग-अलग शहरों जैसे हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, जयपुर, जोधपुर आदि शहरों से अनेकों किताबें आ रही हैं और बहुत अच्छे-अच्छे लोगों का सहयोग भी मिल रहा है।

इन लोगों में नवल डागा, डॉ महेंद्र मधुप, किसान राकेश चौधरी, दिलीप त्रिपाठी, जयप्रकाश मिश्रा, लेखक मोईनुद्दीन चिश्ती जैसे लोगों के अलावा परिजन, शिक्षक व मित्र शामिल हैं।

सामुदायिक पुस्तकालय के माध्यम से वे गांव के लोगों को दुनिया से जोड़ने का काम करना चाहते हैं। स्कूल एवं कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों के लिए अकादमिक पुस्तकों के साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें उपलब्ध करवाना भी उनका लक्ष्य है।

कई विषयों पर आधारित किताबें इकट्ठा हो चुकी है

गांव के बड़े बुजुर्गों को भी वे धार्मिक पुस्तकों के माध्यम से इस लाइब्रेरी से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। गांव के किसानों को खेती से जुड़ी किताबें उपलब्ध करवा रहे हैं, जिससे गांव के आम किसान प्रगतिशील किसान तक का सफर तय कर सकें। इस सूची में अंतरा इन्फोमीडिया द्वारा प्रकाशित खेतों के वैज्ञानिक सीरीज की किताबें, शरद कृषि मासिक के वार्षिक सेट, पिपलांत्री गांव पर लिखी सफलता की कहानियां, जैविक खेती आदि प्रमुख हैं।

सुरेंद्र बताते हैं,“गांव में कक्षा 4 तक पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे नागौर आ गया। जब छुट्टियों में गांव जाता तो देखता कि गांव के अधिकतर लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। ग्रामीण जीवन से जुड़ाव कम होता जा रहा है। कई परिवार तो ऐसे हैं, जो गांव में बहुत कम आते हैं और जो किसान हैं, उसका बेटा खेती से दूर हो रहा है। इन सब बातों के बारे में जब सोचता तो मन दुखी होता। मन में ठान लिया था कि गांव के लिए कुछ करना है।

एक दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‛मन की बात’ कार्यक्रम सुना जिसमें उन्होंने पॉजिटिव न्यूज़ की कुछ वेबसाइट्स के बारे में जानकारी दी, जो ऐसे गुमनाम नायकों के बारे में लिखती हैं जो अखबारों या न्यूज़ चैनलों से बहुत दूर रहते हैं। जब मैंने उनमें से एक वेबसाइट को खोला तो उसमें उत्तरप्रदेश के हसुड़ी ओसानपुर के प्रधान दिलीप त्रिपाठी के बारे में जानकारी मिली, जिनका संपूर्ण गांव सुविधाओं युक्त डिजिटल गांव था। दिलीप त्रिपाठी के ज़रिए जयप्रकाश मिश्रा (जिंदगी फाउंडेशन) जो पुरानी किताबों से गांव में पुस्तकालय चलाते हैं, उनसे जुड़ना हुआ। प्रेरणा लेकर मैंने भी ‛जिंदगी लाइब्रेरी एंड बुक बैंक’ की शुरुआत की।

गाँव में किताबों का सदुपयोग हो रहा है

सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से पुरानी किताबें दान करने की अपील की, सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। राजस्थान के कई शहरों से लोगों ने पुस्तकें देने की बात की। पुरानी किताबों के साथ नई पुस्तकें भी मिल रही हैं और किताबों के जरिये गांव के हालात बदलने की कोशिश में जुटा हूं।”

अपने इस सपने को पूरा करने में जुटे सुरेंद्र को वक़्त गहरा आघात लगा, जब उनके पिता भंवरलाल शर्मा का हार्ट अटैक से निधन हो गया। पल-पल प्रोत्साहित करने वाले पिता का जीवन से जाना उनके लिए गहरा सदमा था। वे आज जिस सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं, उस प्रेरणा के सूत्रधार भी उनके पिता ही हैं।

पुरानी पुस्तकों को दान करने की आदत को वे पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हैं। उनकी सोच है कि ऐसा करने से पर्यावरण का भी फायदा है, किताबें कबाड़ में न जाकर लोग पढ़ेंगे तो पेड़ भी कम कटेंगे।

पत्रकार मोईनुद्दीन चिश्ती के साथ सुरेंद्र शर्मा

जिंदगी लाइब्रेरी एंड बुक बैंक’ को बड़ा आकार देने के लिए युवा सुरेंद्र को हम सबके सहयोग की आवश्यकता है। यदि हमारे पास पुरानी पुस्तकें हैं तो दान कर सकते हैं। दी गई एक एक पुस्तक उनके लिए अनमोल तोहफा है।

जब उन्होंने लाइब्रेरी बनाने का काम शुरू किया तब उनकी उम्र महज़ 18 साल थी। जन्मदिन के अवसर पर खुद के खेत में उन्होंने 51 पेड़ लगाए जो आज सुरक्षित हैं। खेत के चारों ओर 84 नीम के पेड़ हैं। वे वृक्षों की इस संख्या को भी पुस्तकों की संख्या की भांति बढ़ाने में जुटे हैं।

बी पॉजिटिव इंडिया’, सुरेंद्र शर्मा द्वारा बनाई जा रही लाइब्रेरी के प्रयासों की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

फेसबुक पर जुड़ते हुए आप पुस्तकें भेंट कर सकते हैं। उनका मोबाइल नंबर 07357667172 है।

प्रस्तुति: मोईनुद्दीन चिश्ती (देश के वरिष्ठ लेखक- पत्रकार हैं और अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए ख़ासे लोकप्रिय हैं)

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MOINUDDIN RBS CHISHTY
लेखक स्वतंत्र कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं। वे अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए देशभर में लोकप्रिय हैं।

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