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गांव का ‘आत्मनिर्भर माॅडल’ : प्याज़ की पौध से मिला स्वरोजगार का मंत्र, आज खेतों में लहला रही है ‘आमदनी’ की फसल

लोगों को आज भी पहाड़, पहाड़ ही नजर आता है। लेकिन इन्हीं पहाड़ में यदि हौंसलों और मेहनत की फसल बोई जाती है तो नयी इबादत लिखी जाती है। जी हां ये करके दिखाया है उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के पीपलकोटी के समीप उत्तरी अलकनंदा घाटी में बसे मठ गांव के मेहनतकश ग्रामीणों नें।

45 परिवारों के मठ गांव का ‘आत्मनिर्भर माॅडल‘ आज पूरे प्रदेश के लोगों के लिए नजीर बन सकता है। इस गांव के ग्रामीण पूरे साल भर बाजार से कभी भी सब्जियां नहीं खरीदते हैं क्योंकि यहाँ का प्रत्येक परिवार अपने लिए सालभर की सब्जी उत्पादन खुद ही कर लेता है, बाकी सब्जीयों को स्थानीय बाजार में विक्रय कर अच्छी खासी आमदनी भी कर लेते हैं।

खेती कर रोज़गार पा रहें हैं गाँव के युवा

यही नहीं आज ये गांव सब्जी उत्पादन के लिए पूरे जनपद में ‘सब्जी मंडी‘ के नाम से जाना जाता है। ये गांव विगत दो दशक (20 वर्षों) से सब्जी उत्पादन के जरिए आत्मनिर्भर बना हुआ है।

प्याज की पौध नें दिखलाई राह, आज खेतों में उग रही है हर प्रकार की सब्जी

मठ गांव का आत्मनिर्भर होने का सबसे बड़ा योगदान प्याज की पौध का है। दो दशक पहले यहाँ के लोगों नें प्याज की पौध लगाई। उस साल आशाओं के विपरीत मठ गांव में प्याज की बंपर पैदावार हुई। इसके बाद ग्रामीणों ने सब्जी उत्पादन में ध्यान देना शुरू किया। हर साल मठ गांव से अकेले प्याज और मिर्च की लाखों पौधें चमोली जनपद के विभिन्न गांवों के ग्रामीण खरीद कर ले जाते हैं।

प्याज़ की पौध ने बदली गाँव की क़िस्मत

जबकि मठ गांव में आज मटर, प्याज, बीन्स, टमाटर, मिर्च, धनिया, भिंडी, शिमला मिर्च, ककडी, करेला(कडवा), करेला(मीठा/पहाडी), लौंकी, तोरई, कद्दू, लहसुन, राई, पालक, बैंगन सहित लगभग हर सब्जी का उत्पादन बडे पैमाने पर होता है। ग्रामीण अपनी सब्जीयों को पीपलकोटी, चमोली और गोपेश्वर के बाजार में विक्रय करते हैं।

मठ गांव के बंशी प्रसाद सेमवाल ने तो केले का एक बगीचा तैयार किया हुआ है। उन्हें इस बगीचे से अच्छी खासी आमदनी हो जाती है। गांव के गोविन्द सिंह राणा, हुकम सिंह नेगी, अनुसुया नेगी, प्रेम सिंह, कहते हैं कि हमारा पूरा गांव सब्जी उत्पादन के जरिए आत्मनिर्भर है। हमारे पास इतनी डिमांड होती है कि कभी कभी उसको पूरा करना भी मुश्किल हो जाता है। ये मठ (बेमरू) गांव पीपलकोटी के पास है। जबकि दूसरे मठ गांव (छिनका) की कहानी भी हुबहु ऐसी है।

प्याज़ के बाद अन्य सब्ज़ियाँ भी उगाई जा रही हैं

वास्तव में देखा जाए तो पहाड़ के मेहनतकश लोगों नें पहाड़ की परिभाषा बदल कर रख दी है। पहाड़ के लोगों नें दिखला दिया है कि यदि दृढ संकल्प और इच्छा शक्ति से कोई भी कार्य किया जाय तो जरूर सफलता मिलती है। पहाड़ जैसी शुद्ध आबोहवा, स्वच्छ पानी, बहुमूल्य औषधि गुणों से भरपूर अनाज और फल हमेशा व्यक्ति को निरोगी रखता है।

यदि पहाड़ की जवानी पहाड़ में रहकर रोज़गार की संभावनाओं को तलाशे तो पहाड़ की बंजर भूमि में सोना उगाया जा सकता है। लाॅकडाउन के बाद रोजगार के अवसर कम हो गयें हैं ऐसे में पहाड़ के युवाओं और दूसरे गांव के लोगों को मठ गांव के आत्मनिर्भर माॅडल से सीख लेने की आवश्यकता है ताकि पहाड़ों में रोजगार के अवसरों का सृजन हो सके। जिससे अपने ही घर में परिवार के लिए साल भर की सब्जियां मिल जायेगी और बाकी सब्जी का विक्रय करके अच्छा खासा मुनाफा और आमदनी हो जायेगी।

मठ गांव के मेहनतकश किसानों को हमारी ओर से ढेरों बधाइयाँ। आशा और उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में दूसरे गांव के लोग भी आपका आत्मनिर्भर माॅडल अपनाएंगे.

संजय चौहान
संजय चौहान
संजय चौहान उत्तराखंड से हैं और पॉजिटिव जर्नलिज्म के लिए जाने जाते हैं.

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