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प्रतियोगी परीक्षाओं में विफलता से लेकर 2 नेशनल अवार्ड्स तक, वीरेंद्र परिहार कैसे बनें कृषि का चेहरा

सफलता की यह कहानी उस इंसान की है, जिसे आज किसी परिचय की जरूरत नहीं है। कभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला यह शख्स कई बार उनमें सफल होने पर भी हर बार लास्ट सलेक्शन में रह ही जाता। शायद किस्मत ने उनके लिए कुछ और सोच रखा था और वह उन्हें बहुत जल्द मिलने भी वाला था।

बात साल 2006 की है, जब राजधानी जयपुर स्थित ‛दूरदर्शन केंद्र’ में ‛प्रसार भारती’ की भर्ती के अंतर्गत एक पद आया तो वीरेंद्र परिहार को लगा,“क्या एक पद पर भी कोई चयन हो सकता है क्या भला?

मन में विश्वास था! नियति हर बार तो दोराहे पर लाकर खड़ा नहीं कर सकती! उसी विश्वास को आधार बनाकर आवेदन कर ही दिया। परिणाम स्वरूप उसी एक पद पर वे बतौर कार्यक्रम निर्माता नियुक्त हो गए। तब का दिन था और आज का दिन है उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

एक प्रोग्राम के दौरान वीरेंद्र परिहार

देशभर के किसानों और विशिष्ट हस्तियों के इंटरव्यू लेने वाले वीरेंद्र परिहार अपनी कहानी सुनाते हुए कहते हैं,“ माता निर्मला देवी, पिता जवाहरलाल के आशीर्वाद और जीवनसंगिनी प्रियंका के साथ के चलते पहले ही दिन से दूरदर्शन केंद्र, जयपुर में कृषि कार्यक्रमों के निर्माण एवं निर्देशन जिम्मेदारी मिली। यहीं से कृषि पत्रकार के रूप में मेरा सफ़र शुरू हुआ।

पहले ही रोज़ निदेशक नंद भारद्वाज ने उनसे कहा कि आज ‛कृषि दर्शन’ कार्यक्रम में आपकी लिखी स्क्रिप्ट प्रसारित होगी। यह सुनकर उन्हें ऐसा लगा जैसे बड़ी जिम्मेदारी मिल गई है। यह तो बस उनके कृषि कार्यक्रमों में रम जाने की एक शुरुआत भर थी।

हर रोज उन्हें ऐसा लगता जैसे एक अध्याय बीत गया। धीरे धीरे स्क्रिप्ट, स्वयं की आवाज में कमेंट्री, लाइव एंकरिंग, कैमरा चलाने से लेकर निर्देशन तक रगों में उतरता चला गया।

पत्रकारीता के दौरान वीरेंद्र परिहार

वे कार्यक्रम निर्माता एवं वर्तमान निदेशक डॉ ओमप्रकाश के संरक्षण में पली बढ़ी इस यात्रा के लिए उनके आभारी हैं। कृषि पत्रकारिता की पहली सीढ़ी चढ़ाने के वरिष्ठ कृषि पत्रकार डॉ महेंद्र मधुप के भी ऋणी हैं।

धीरे-धीरे वे कैमरा यूनिट लेकर राजस्थान भर में खेती-किसानी शूट करने जाने लगे। वे बताते हैं,“आज भी जब किसानों के बीच जाता हूं एक आनंद की अनुभूति करता हूं। लगभग हर जिले में कृषि कार्यक्रमों को प्रभावी और बेहतरीन बनाने के उद्देश्य से कृषि प्रसारण यात्रा की।

जहां भी गया, खेत-खलिहान आधारित सफलता की गाथा विषयक कार्यक्रम बनाएं जो कृषि दर्शन एवं डीडी किसान में प्रसारित हुए।

परिजनों के साथ वीरेंद्र परिहार

पूरी टीम के कार्यों को राज्यभर में सराहना मिली। साल 2009 में रचनात्मक कृषि पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित जवाहरलाल दर्डा लोकमत पत्रकारिता पुरस्कार मिला। यहीं से हौसला बढ़ा की अब कुछ कर दिखाना है। धीमे-धीमे सम्मान गौण हो गए और प्रसारण यात्रा बड़ी हो गई।

साल 2013 में कृषि कार्यक्रमों को नई भूमिका (स्वतंत्र प्रभार) में करने का दायित्व मिला। साल 2015 में डीडी किसान आया, जी-तोड़ मेहनत की। नतीज़तन साल 2016 में ‛बेस्ट एग्रीकल्चर प्रोड्यूसर’ का पहला ‛डीडी किसान राष्ट्रीय पुरस्कार’ दिल्ली में मिला।

इसी साल 16 जुलाई को ‛भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ स्थापना दिवस के मौके आईसीएआर, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार का सर्वोच्च चौधरी चरणसिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता पुरस्कार भी मिला।”

अवार्ड ग्रहण करते हुए वीरेंद्र परिहार

खेती-किसानी के कार्यक्रमों में नवाचार करते हुए उन्होंने किसान पाठशाला, किसान की बात किसान के साथ, कृषि प्रश्नोत्तरी, घूमते-फिरते , किसान संवाद और किसान सेमिनार जैसे कार्यक्रम शुरू किए जिन्हें भरपूर सराहना मिली। अब तक वे करीब 3500 कृषि प्रधान कार्यक्रमों का निर्माण, निर्देशन सहित लगभग 350 कृषि विषयक लेख चुके हैं।

आज अपनी कामयाबी के लिए वे हर उस इंसान के प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं, जिनकी वजह से उन्हें यह सम्मानजनक स्थान मिल सका।

फेसबुक पर वीरेंद्र परिहार से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। आप उनसे मोबाइल नम्बर 09829684550 पर बात भी कर सकते हैं।

एक कार्यक्रम के दौरान वीरेंद्र परिहार

बी पॉजिटिव इंडिया’, वीरेंद्र परिहार द्वारा किए कार्यों की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

प्रस्तुति: मोईनुद्दीन चिश्ती (लेखक कृषि पत्रकार हैं और अपनी सकारात्मक पत्रकारिता के लिए देशभर में खासे लोकप्रिय हैं)

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MOINUDDIN RBS CHISHTY
लेखक स्वतंत्र कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं। वे अपनी सकारात्मक लेखनी के लिए देशभर में लोकप्रिय हैं।

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